जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक पीएनबी में 1.8 अरब डॉलर के घोटाले का पर्दाफाश। पिछली तिमाही में एसबीआइ को 17 वर्षों बाद पहली बार घाटा और सारे सरकारी बैंको को संयुक्त तौर पर 15,200 करोड़ रुपये का घाटा। ये कुछ उदाहरण हैं जो बताते हैं कि एनपीए की समस्या किस तरह से देश के बैंको को खोखला कर रही है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि आने वाले दिनों में एनपीए की समस्या और विकराल हो सकती है।

दो दिन पहले आरबीआइ ने एनपीए को लेकर जो नए नियम बनाये हैं उससे बैंकिंग तंत्र में दो लाख करोड़ रुपये के नए एनपीए सामने आने का अनुमान है। अगर यही हाल रहा तो सरकार की तरफ से इन बैंकों को दिए गए 88 हजार करोड़ रुपये के पैकेज पर पानी फिर सकता है। इस नई मुसीबत का सामना करने के लिए इन बैंकों को 2 हजार करोड़ रुपये की और राशि की दरकार होगी।

आरबीआइ के निर्देश के बाद बकाये कर्ज के निपटारे के मौजूदा आधे दर्जन नियम खत्म हो गये हैं। अब 2000 करोड़ रुपये से ज्यादा के कर्ज पर हर हफ्ते बैंको को रिपोर्ट देनी होगी। इससे उन ग्राहकों की पहचान जल्दी होगी, जिनके कर्ज की राशि एनपीए होने के कगार पर है। इससे बैंक ज्यादा सतर्क रहेंगे। साथ ही किसी भी कर्ज डिफॉल्ट के मामले में उसका समाधान छह महीने के भीतर निकालना होगा। नहीं तो उसे दिवालिया प्रक्रिया में ले जाना होगा। क्रेडिट स्विस, क्रिसिल ने अनुमान लगाये हैं कि नए प्रावधान से दो लाख करोड़ रुपये के अतिरिक्त एनपीए का बोझ बैंकिंग सेक्टर पर पड़ेगा। यानी अगर यह सच हो गया तो मार्च, 2018 तक भारतीय बैंकों का एनपीए मौजूदा 9.40 लाख करोड़ रुपये से बढ़ कर 11 लाख करोड़ रुपये के करीब पहुंच सकता है।

एनपीए ने एक तरह से सरकारी बैंकों को अंदर से खोखला कर दिया है। अक्टूबर-दिसंबर, 2017 की तिमाही में एसबीआइ को 2416 करोड़ रुपये की हानि हुई है, बैंक को 17 वर्षों बाद हानि हुई है। इसी अवधि में बैंक ऑफ इंडिया को 2,341 करोड़ रुपये, कार्पोरेशन बैंक को 1240 करोड़ रुपये, इंडियन ओवरसीज बैंक 971 करोड़ रुपये और यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को 637 करोड़ रुपये की हानि हुई है। केयर रेटिंग एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी बैंक ने इस तिमाही में एनपीए की वजह से 51 हजार करोड़ रुपये का समायोजन किया और इन्हे संयुक्त तौर पर 15,200 करोड़ रुपये की हानि हुई है। दूसरे शब्दों में कहें तो अगर एनपीए के लिए प्रावधान नहीं करना होगा तो 51 हजार करोड़ रुपये का उपयोग ये बैंक अपनी सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने में करते। मौजूदा तिमाही के दौरान भी बैंकों को भारी हानि होने के पूरे आसार है।

एनपीए की समस्या में सरकारी बैंक पिछले कई वर्षों से जकड़े हुए हैं, लेकिन पिछले दो वर्षों में यह समस्या बेहद गंभीर हो चुकी है। सरकार की तरफ से उठाये जाने वाले किसी भी कदम के खास परिणाम नहीं निकले हैं। पीएम नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते संसद में एनपीए की समस्या को कांग्रेस राज का पाप बताया था। बैंक का बढ़ता एनपीए परोक्ष तौर पर बैंक की ग्राहक सेवा को प्रभावित करती है। इससे बैंकों के लिए कर्ज देने की लागत बढ़ती है। वे तकनीकी वगैरह पर ज्यादा खर्च नहीं कर पाते।

 

By Tilak Raj