जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। वेतन व पेंशन का बढ़ता बोझ, आय बढ़ाने वाले स्त्रोतों की कमी उस पर किसानों की कर्ज माफी और जीएसटी को लेकर जारी उहा पोह, इन सभी तथ्यों को जोड़ते हुए आरबीआइ ने देश के सभी राज्यों की आर्थिक सेहत की जो तस्वीर गुरुवार को पेश की है वह बहुत आकर्षक नहीं है। आरबीआइ हर वर्ष यह रिपोर्ट सभी राज्यों के बजटीय प्रपत्रों का आकलन करने के बाद पेश करता है।

केंद्रीय बैंक की इस रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2017-18 में राज्यों का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में इनका राजकोषीय घाटा 2.7 फीसद के लक्ष्य के मुकाबले 3.1 फीसद रहा है। बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, झारखंड समेत तमाम पूर्वोत्तर राज्य आने वाले दिनों में राजकोषीय संतुलन की केंद्र की कोशिशों पर भी पानी फेर सकते हैं।

केंद्रीय बैंक की रिपोर्ट राज्यों की राजकोषीय स्थिति को लेकर कई चिंताजनक बातें पेश करती है। मसलन, वर्ष 2011-12 के बाद से राजकोषीय संतुलन की जिन कोशिशों का असर राज्यों के बजट पर दिखाई देने लगा था वे पिछले तीन वित्त वर्षो से नाकाफी साबित हो रहे हैं। विगत तीन वर्षो से लगातार राज्य समग्र तौर पर राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल नहीं कर पा रहे हैं। चालू साल में क्या होगा यह भी बहुत साफ नहीं दिख रहा है। क्योंकि कई राज्यों में किसानों की कर्ज माफी का फैसला किया जा रहा है।

पिछले वित्त वर्ष के अंत में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों ने ऐसी घोषणा की थी। इन सभी का असर वर्ष 2018-19 के वित्त वर्ष के बजट पर पड़ रहा है। कम से कम दस राज्यों में इस वर्ष चुनाव होने हैं और इन सभी राज्यों पर इसका असर होगा। किसानों की कर्ज माफी पर सवाल उठाते हुए आरबीआइ ने कहा है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है कि कर्ज माफी की वजह से खेती की उत्पादकता बढ़ी हो। साथ ही इससे महंगाई बढ़ने का भी खतरा रहता है।

यह भी देखा गया है कि जिन राज्यों में किसानों को कर्ज माफी दी गई है उनकी पूंजीगत राजस्व कम हुए हैं। इसका असर राज्यों की आर्थिक विकास दर पर भी हुआ है। बैंकों की सामान्य गतिविधियों पर असर पड़ता है क्योंकि यह कर्ज लेने वालों में यह संदेश देता है कि वह कर्ज की अदायगी नहीं भी करेंगे तो हो सकता है कि कर्ज माफ हो जाए।

पिछले वित्त वर्ष के दौरान राज्यों की तरफ से किसानों की कर्ज माफी की राशि उनके कुल जीडीपी का 0.32 फीसद रही है जबकि पहले इसके 0.27 फीसद रहने का अनुमान लगाया गया था।

हालांकि सकारात्मक बात यह है कि इस वर्ष जीएसटी में स्थिरता आने की वजह से राज्यों के संग्रह भी बढ़ने की संभावना है। सरकार की तरफ से प्रत्यक्ष कर आधार बढ़ाने की जो कोशिश की गई है उससे भी कर संग्रह बढ़ेगा जिसकी वजह से राज्यों को ज्यादा हिस्सा मिलने संभावना भी है। इसके साथ आरबीआइ ने राज्यों से कहा है कि वह राजस्व बढ़ाने के नये संसाधनों पर ज्यादा शोध करे और खर्चे को लेकर ज्यादा सावधानी बरते।

By Bhupendra Singh