'आज की मजबूती कल की सुरक्षा नहीं', बढ़ते वैश्विक कर्ज पर RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने जताई चिंता; गिनाए 5 बड़े खतरे
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बढ़ते वैश्विक कर्ज पर चिंता व्यक्त की है और पांच प्रमुख जोखिमों ...और पढ़ें

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बढ़ते वैश्विक कर्ज पर जताई चिंता (फाइल फोटो)
HighLights
वैश्विक कर्ज के बढ़ते स्तर पर आरबीआई गवर्नर ने जताई चिंता।
संजय मल्होत्रा ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष पांच जोखिम गिनाए।
कहा आज की वित्तीय मजबूती कल की सुरक्षा नहीं हो सकती।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। कोविड के बाद दुनिया भर में जिस तरह से कर्ज का स्तर बढ़ता जा रहा है, उसको लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर ने ना सिर्फ चिंता जताई है बल्कि वैश्विक समुदाय का ध्यान भी इस तरह से आकर्षित किया है।
आईआरआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शनिवार को कहा कि वैश्विक कर्ज को हल्के में नहीं लिया जा सकता। ऊंची वृद्धि के कारण इस क्षेत्र पर नजर रखना जरूरी है।
कौटिल्य इकोनोमिक कान्क्लेव में वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर बोलते हुए उन्होंने पश्चिम एशिया संघर्ष के झटके को फिलहाल सहन कर लेने की बात कही, लेकिन चेताया कि माहौल चुनौतीपूर्ण है और संघर्ष ने मुद्रास्फीति के दबाव के साथ व्यवस्था की कमजोरियां भी बढ़ाई हैं।
लंबे समय से चली आ रही वित्तीय स्थिरता के बावजूद सतर्कता बनाए रखने का आह्वान करते हुए गवर्नर मल्होत्रा ने शनिवार को कहा कि उन्हें फिलहाल तनाव के कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिख रहा, लेकिन “आज की मजबूती का मतलब कल की सुरक्षा नहीं हो सकता।
पिछले दो दशकों का भारत का अनुभव बताता है कि बैंकिंग और वित्तीय दबाव रातोंरात बन सकते हैं, लेकिन उन्हें सुलझाने में सालों लग जाते हैं और यह प्रक्रिया बेहद कष्टदायक होती है।”
इस क्रम में उन्होंने वैश्विक अर्थव्यवस्था के समक्ष पांच प्रमुख जोखिमों को गिनाया। ये हैं, बढ़ता वैश्विक कर्ज, खासकर एआई की मदद से किया गया परिसंपत्ति मूल्यांकन, ऊंचा लीवरेज (कर्ज का सामान्य से काफी ज्यादा होना), प्राइवेट क्रेडिट और साइबर जोखिम।उनका कहना था कि ये जोखिम अकेले संभवतः अभी बड़ी चिंता पैदा नहीं करती हैं लेकिन इनका एक साथ होना वैश्विक वैश्विक वित्तीय ढांचे पर भारी दबाव डाल सकता है।
वैश्विक कर्ज के खतरे को समझाते हुए गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि दुनिया भर में कर्ज का अनुपात जीडीपी की तुलना में बढ़ गया है, परिपक्वता अवधि घट गई है और सरकारी बॉन्ड पर प्रतिफल तेजी से सख्त हुआ है। इसका सीधा असर कई मोर्चों पर पड़ता है। सरकारों के लिए उधारी महंगी होने से राजकोषीय गुंजाइश सिकुड़ती है और कर्ज का गणित बिगड़ता है।
कंपनियों पर वित्तीय हालात सख्त होने से कर्ज चुकाने की क्षमता पर दबाव बनता है। बैंकों के लिए सरकारी बॉन्ड पर नुकसान बैलेंस शीट कमजोर कर सकता है, ठीक उसी समय जब संकटग्रस्त बैंकों को सहारा देने में सरकारें खुद राजकोषीय दबाव में हों।
आईआरआई गवर्नर का यह बयान तब आया है जब दुनिया की सबसे बड़ी इकोनमी अमेरिका में बढ़ते कर्ज को लेकर कई विशेषज्ञों ने हाल में चिंता जताई है। अमेरिका का कुल सार्वजनिक कर्ज सितंबर 2026 के अंत तक करीब 40.2 लाख करोड़ डॉलर था, जनता के पास कर्ज जीडीपी का लगभग 100 प्रतिशत और कुल कर्ज-जीडीपी अनुपात करीब 122–123 फीसद।
भारत का विदेशी कर्ज जून 2026 के अंत में 778.2 अरब डॉलर था। वित्त मंत्रालय ने हाल हीमें कहा था कि यह जीडीपी के अनुपात में 20.8 फीसद है जो काफी नियंत्रित है। वैसे दुनिया पर कुल कर्ज रिकार्ड स्तर पर है।
इंस्टीट्यूट आफ इंटरनेशनल फाइनेंस के मुताबिक 2026 की पहली छमाही में सरकार, कंपनी, बैंक और परिवारों को मिलाकर यह 365 लाख करोड़ डॉलर से ऊपर पहुंच गया और सिर्फ छह महीनों में करीब 10 लाख करोड़ डॉलर बढ़ा है।
गवर्नर मल्होत्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि आईआरआई का रुख क्रिप्टोकरेंसी को लेकर नहीं बदला है और इस बारे में भारत सतर्क रुख बनाए हुए है। हालांकि टोकनाइजेशन जैसी तकनीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
मल्होत्रा ने कहा कि केंद्रीय बैंक और बाहर पीपीपी मोड में इनमें से कुछ तकनीकों का उपयोग हो रहा है, पर क्रिप्टो को लेकर हम सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपना रहे हैं। इससे जुड़ी कई तरह की चिंताएं है जैसे एकल मुद्रा का प्रचलन, पूंजी प्रवाह पर असर आदि।
