नई दिल्ली, सुरेंद्र प्रसाद सिंह। नीति आयोग ने गुरुवार को 'भारत में शहरी नियोजन क्षमता में सुधार' पर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की। इसके मुताबिक देश के ज्यादातर शहरी क्षेत्रों का न तो कोई मास्टर प्लान है और न ही वहां टाउन प्लानर आदि की नियुक्ति की गई है। ऐसे शहरी निकायों और कस्बाई क्षेत्रों में रहने वालों की हालत तंग है। बुनियादी ढांचे के अभाव के साथ वहां बसने वालों की मूलभूत जरूरतें तक पूरी नहीं हो रही हैं। यही वजह है कि थोड़ी सी बरसात भी शहरवासियों की मुश्किलों का सबब बन जाती है।

बुनियादी ढांचे के अभाव में लोगों की मूलभूत जरूरतें तक नहीं हो रहीं पूरी

एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2050 तक शहरों की आबादी बढ़कर 88 करोड़ से अधिक हो जाएगी। विशेषज्ञों को आशंका है कि समय रहते शहरी नियोजन को सही और उचित तरीके से लागू नहीं किया गया तो हालात चिंताजनक और भयावह हो सकते हैं। नीति आयोग की एडवाइजरी कमेटी की सिफारिशों में कोरोना काल के दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं की भयावह स्थिति के मद्देनजर स्वास्थ्य सुविधाओं से लैस शहरों की अपेक्षा की गई है। इसके अलावा शहरी भूमि के अधिकतम इस्तेमाल, मानव संसाधन की क्षमताओं को बेहतर बनाने और उसके उपयोगों के साथ नगरीय शासन व्यवस्था को सुदृढ़ करने की सिफारिश की गई है।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में स्थानीय नेतृत्व की क्षमता का निर्माण करने, प्राइवेट सेक्टर की भूमिका को और बढ़ाने, शहरी नियोजन की शिक्षा प्रणाली को प्रगतिशील बनाने के पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है। कमेटी की रिपोर्ट के पहले हिस्से में देश के शहरी क्षेत्र की ताजा तस्वीर खींची गई है। इसके मुताबिक देश के 7,933 छोटे बड़े शहरों और कस्बों में 65 फीसद के पास अपना कोई मास्टर प्लान नहीं है। नियोजित 4,041 शहरी निकायों में से 52 फीसद के पास भी मास्टर प्लान नहीं है।

रिपोर्ट जारी करने के बाद योजना आयोग के उपाध्यक्ष डा. राजीव कुमार ने बताया कि देश के ज्यादातर शहरी निकायों के पास अपना कोई टाउन प्लानर तक नहीं है। भला ऐसे में शहरी नियोजन हो तो कैसे? उन्होंने शहरी क्षेत्रों की चिंताजनक स्थिति का जिक्र करते हुए इस रिपोर्ट को लागू करने की अपील की है। राजीव कुमार ने बताया कि इस रिपोर्ट को तैयार करने में राज्यों की सहभागिता रही है।

Edited By: Arun Kumar Singh