सांसदों की अमर्यादित भाषा पर लगेगी लगाम? राज्यसभा समिति ने दिए सख्त नियम के सुझाव
राज्यसभा की आचार समिति ने सांसदों के लिए सदन के भीतर, बाहर और सोशल मीडिया पर अमर्यादित बयानबाजी रोकने का प्रस्ताव दिया है।

राज्यसभा में सांसदों की अमर्यादित भाषा पर लगेगी लगाम। (फाइल)
HighLights
आचार समिति ने सांसदों की अमर्यादित बयानबाजी रोकने का प्रस्ताव दिया।
संसदीय गरिमा बनाए रखने और विशेषाधिकार दुरुपयोग रोकने पर जोर।
राजनीतिक दलों से कड़े नियमों और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर सुझाव मांगे।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। संसद की गरिमा को सर्वोच्च रखते हुए राज्यसभा की आचार समिति (एथिक्स कमेटी) ने एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी प्रस्ताव पेश किया है।
इसके तहत अब राज्यसभा सदस्यों के लिए सदन के भीतर, बाहर तथा सोशल मीडिया जैसे डिजिटल मंचों पर ऐसी बयानबाजी करने पर रोक लगाने की तैयारी है, जिससे किसी संवैधानिक संस्था, साथी सदस्य या अन्य सार्वजनिक हस्तियों की गरिमा को ठेस पहुंचे।
समिति ने अपनी रिपोर्ट के लिए तैयार प्रश्नावली में स्पष्ट रूप से यह सुझाव दिया है कि आचार संहिता में यह प्रविधान जोड़ा जाए कि सांसद संसदीय कार्यवाही के दौरान मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (विशेषाधिकार) का दुरुपयोग न करें। अक्सर यह देखा गया है कि इस सुरक्षा कवच का इस्तेमाल दूसरों की मानहानि या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के लिए किया जाता है।
हाल के वर्षों में विधायी कार्रवाइयों में बढ़ती अनुशासनहीनता और स्थापित संसदीय परंपराओं की अनदेखी पर समिति ने गहरी चिंता व्यक्त की है। इसी को ध्यान में रखते हुए, भाजपा सांसद घनश्याम तिवाड़ी की अध्यक्षता वाली इस समिति ने राजनीतिक दलों, राज्य विधानसभाओं और अंतरराष्ट्रीय निकायों से व्यापक विचार-विमर्श शुरू किया है।
समिति ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या राष्ट्रीय नायकों और संवेदनशील मुद्दों पर बोलते समय सांसदों के लिए कोई विशेष और संयमित दिशा-निर्देश तय किए जाने चाहिए।
उल्लेखनीय है कि मार्च 2025 में तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने इंटरनेट मीडिया के बढ़ते प्रभाव और आधुनिक तकनीकी बदलावों को देखते हुए समिति को 1998 की एस.बी. चव्हाण समिति की रिपोर्ट की समीक्षा करने के निर्देश दिए थे।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में चुनाव आयोग और उसकी कार्यप्रणाली जैसे संवेदनशील विषयों पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच अक्सर तीखी तकरार देखने को मिलती है।
समिति ने राजनीतिक दलों से यह भी पूछा है कि क्या अमर्यादित भाषा के प्रयोग को रोकने के लिए और अधिक कड़े नियम लागू किए जाने चाहिए, तथा नियमों के उल्लंघन पर किस तरह की अनुशासनात्मक कार्रवाई उचित होगी। सभी दलों को इस पर अपने विचार और सुझाव भेजने को कहा गया है।
(समाचार एजेंसी पीटीआई के इनपुट के साथ)
