नई दिल्ली, संजय सिंह। चौकीदार रहित क्रासिंगों पर होने वाली दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने वाली रेलवे की योजनाएं तकनीकी अथवा वित्तीय अड़चनों का शिकार हो गई हैं। साढ़े तीन वर्ष पहले आंध्र प्रदेश में रेलवे क्रासिंग पर हुए भयानक स्कूली बस हादसे के बाद रेलवे ने इस तरह के हादसों से निपटने के लिए तकनीकी उपाय खोजने का फैसला किया था। इसके तहत दो प्रोजेक्ट शुरू किए गए थे। इनमें एक में रेलवे विकास एवं मानक संगठन (आरडीएसओ) और दूसरे में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की मदद ली गई थी।

इसरो के साथ शुरू किए गए प्रोजेक्ट के तहत एक ऐसी अलर्ट सेवा प्रारंभ करने का प्रस्ताव था जिसके तहत चौकीदार रहित क्रासिंगों के एक किलोमीटर के दायरे में आने वाले सभी वाहन के चालकों और यात्रियों को हूटर के जरिए सतर्क करने की योजना थी। इसमें इसरो को उपग्रह की मदद से ट्रेनों की वास्तविक समय के आधार पर ट्रैक करने के इंतजाम करने थे। इसमें चिप आधारित एक उपकरण ट्रेनों में और एक क्रासिंग गेट पर लगाया जाना था। विचार यह था कि जैसे ही ट्रेन क्रासिंग के 4 किलोमीटर के दायरे में आएगी गेट पर लगा हूटर बज जाएगा और 500 मीटर की दूरी तक आते आते हूटर की आवाज क्रमश: तेज होती जाएगी। ट्रेन पास होते ही हूटर बंद हो जाएगा।

रेलवे बोर्ड के एक अधिकारी के अनुसार पिछले वर्ष जून में शुरू हुए पायलट प्रोजेक्ट के तहत पांच चौकीदार क्रासिंगों के साथ वहां से गुजरने वाली चुनिंदा ट्रेनों में उपकरण लगाए गए थे। परंतु इस वर्ष जनवरी-फरवरी में हुए ट्रायल इसकी कई खामी पाई गई। हूटर पूरी तरह सफल नहीं हुआ। जिसके बाद प्रोजेक्ट को और अनुसंधान के लिए स्थगित कर दिया गया था। प्रोजेक्ट के लिए इसरो ने सात उपग्रहों वाले अपने रीजनल नेवीगेशन सेटेलाइट सिस्टम का उपयोग किया था।

एडवांस वार्निंग सिस्टम

इसरो से पहले आरडीएसओ को एसएमएस आधारित अलर्ट प्रणाली (एडवांस वार्निग सिस्टम) विकसित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। रेडियो फ्रीक्वेंसी एंटीना आधारित इस प्रणाली में क्रासिंगों के आसपास एक किलोमीटर के दायरे में सभी वाहन चालकों व यात्रियों के मोबाइल पर एसएमएस भेजकर आगे आने वाली क्रासिंग और ट्रेन के बारे में सावधान किया जाना था। इसमें जैसे-जैसे वाहन क्रासिंग के नजदीक पहुंचता पहले कई एसएमएस और फिर ब्लिंकर और अंतत: हूटर के जरिए वाहन चालक को सावधान करने की व्यवस्था थी। साथ ही ट्रेन ड्राइवर को भी क्रासिंग के बारे में सूचना देने का प्रावधान था।परंतु यह अव्यवहारिक पाया गया था। 

By Manish Negi