माला दीक्षित, नई दिल्ली। आरक्षण हमेशा से राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दा रहा है। यह वोट दिलाऊ भी माना जाता है, इसीलिए रूप बदल-बदल कर फैसला होता रहा है। हाल ही में हरियाणा सरकार निजी क्षेत्र में पचास हजार रुपये तक के वेतन की नौकरियों में स्थानीय निवासियों को 75 फीसद आरक्षण का कानून लाई है, लेकिन इसका कोर्ट की कसौटी पर खरा उतरना मुश्किल है। संविधान जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव की मनाही करता है। साथ ही संविधान में प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता, कहीं भी बसने और रोजगार की आजादी का मौलिक अधिकार है। 

इन कसौटियों से गुजरना होगा

संविधान के अनुसार निजी कंपनियां राज्य की परिधि से भी बाहर हैं। हरियाणा के कानून को कोर्ट में इन कसौटियों से गुजरना होगा। हरियाणा से पहले आंध्र प्रदेश ने इसे लागू किया था जिसका मामला हाई कोर्ट में लंबित है। कनार्टक ने भी ऐसा प्रयास किया था। महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ने भी ऐसा कानून लाने की घोषणा की थी जबकि झारखंड तैयारी में जुटा है।

क्‍या कहते हैं हरीश साल्वे

देश के जानेमाने वकील हरीश साल्वे कहते हैं कि सिर्फ निवास के आधार पर आरक्षण देना और उसे सभी पर लागू करना साफ तौर पर असंवैधानिक दिखाई देता है। ऐसा नियम भेदभाव करने वाला है। हालांकि वह कहते हैं कि उन्हें हरियाणा के मामले के सारे तथ्यों की जानकारी नहीं है। साल्वे की बात से साफ होता है कि हरियाणा के कानून को टिकने के लिए कोर्ट में संघर्ष करना होगा, क्योंकि यहां मामला सरकारी नौकरी में आरक्षण का नहीं है, बल्कि निजी क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण का है।

प्राइवेट कंपनियां राज्य की परिभाषा में नहीं : पूर्व मुख्य न्यायाधीश

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढा कहते हैं कि प्राइवेट कंपनियां संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य की परिभाषा में नहीं आतीं। उन पर मौलिक अधिकार लागू करने का दबाव नहीं डाला जा सकता। संविधान के डायरेक्टिव पिंसिपल्स में रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। इसके लिए कानून का उद्देश्य और प्रावधान देखना होगा, लेकिन इतना जरूर है कि स्थानीय के लिए आरक्षण से बाहरी लोगों के अधिकार तो प्रभावित होते ही हैं। सरकार निजी क्षेत्र में स्थानीय कोटा घोषित कर रही है, इसलिए इसमें देखा जाएगा कि अनुच्छेद 14 में मिला बराबरी का अधिकार इससे प्रभावित होता है कि नहीं। कोर्ट में सबसे बड़ा पेंच निजी कंपनियों पर आरक्षण लागू करने को लेकर फंस सकता है।

यह निश्चित तौर पर ज्यादा पेचीदा मुद्दा : मुकुल रोहतगी

पूर्व अटार्नी जनरल और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी कहते हैं कि यहां प्राइवेट सेक्टर बड़ा मुद्दा है। महाराष्ट्र प्रापर्टी ओनर्स केस सुप्रीम कोर्ट की नौ न्यायाधीशों की पीठ में विचाराधीन है। उस केस में एक मुद्दा है कि क्या प्राइवेट रिसोर्स अनुच्छेद 39 के तहत आएंगे कि नहीं। उस मामले में सवाल आया था कि क्या मकान मालिक किरायेदार के केस में निजी संपत्ति भी अधिग्रहीत की जा सकती है। हरियाणा का मामला भी प्राइवेट इंडस्ट्री का है, इसलिए यह निश्चित तौर पर ज्यादा पेचीदा मुद्दा है। संविधान बराबरी की बात करता है। उसमें भेदभाव की मनाही है। आरक्षण अपवाद है जिसकी पूरी अवधारणा पीछे छूटे लोगों को बराबरी पर लाना है। आरक्षण में कोर्ट यही देखता है कि तर्कसंगत वर्गीकरण है कि नहीं। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश और विधि आयोग के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस बीएस चौहान कहते हैं कि कोर्ट सभी पहलुओं को परखेगा।

पूर्व के फैसलों पर क्या रहा शीर्ष कोर्ट का रुख

अगर पूर्व के फैसलों पर निगाह डालें तो 1984 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप जैन मामले में सन आफ सायल (धरती पुत्र) यानी निवास स्थान के आधार पर आरक्षण की चर्चा की थी। कोर्ट ने उसमें टिप्पणी की थी कि निवास के आधार पर नौकरी में आरक्षण की नीतियां असंवैधानिक हैं, लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं दी थी, क्योंकि कोर्ट के सामने सीधे तौर पर यह मुद्दा नहीं था। इसके बाद 1995 में सुनंदा रेड्डी केस में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप जैन मामले में की गई टिप्पणी पर मुहर लगाते हुए आंध्र प्रदेश सरकार की तेलुगु माध्यम से पढ़ने वालों को पांच फीसद अतिरिक्त वेटेज देने के नियम को रद कर दिया था। निवास स्थान मामला 2002 में भी आया था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की सरकारी शिक्षक भर्ती रद की थी। 2019 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भर्ती अधिसूचना रद की थी जिसमें यूपी की मूल निवासी महिलाओं को प्राथमिकता की बात कही गई थी। स्पष्ट है कि हरियाणा के फैसले के लिए राह आसान नहीं है।