[राजकिशोर] नई दिल्ली। राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि क्रांति जिनके कंधों पर सवार होकर आती है, अपना पहला शिकार उन्हीं को बनाती है। लोहिया के इस बात का मर्म अब शायद अरविंद केजरीवाल को समझ में आने लगा होगा। जनता की सरकार, जनता की राय और उच्च नैतिक मूल्य जैसे नारों के साथ सत्ता में आए केजरीवाल के लिए उन्हें कायम रखना बड़ी चुनाती है और इसका अंदाज उन्हें शायद गृह प्रवेश से पहले ही हो गया।

इस तरीके का जनदबाव उनपर बना कि उन्होंने अड़ने के बजाय तुरंत जनता की राय को सम्मान देकर अपनी साख बचाने की कोशिश की, लेकिन अभी भी कई प्रश्न अनुत्तरित हैं कि यह काम पहले ही क्यों नहीं हुआ? उन्होंने सरकारी आवास लेने के लिए हामी भरने से पहले ही जनता से राय क्यों नहीं ली? फ्लैट के नवीनीकरण में किए गए खर्च और मीडिया में मामला उछलने के बाद ही उन्हें ऐसा क्यों लगा कि अब जनता से राय लेनी चाहिए? क्या उन्हें पहले इस बात का अंदाजा नहीं था कि उनके चाहने वाले भी इसका विरोध कर सकते हैं? हुआ ऐसा ही और उन्होंने जनता का हवाला देकर फैसला बदल लिया, लेकिन अभी यह तय नहीं है कि नवीनीकरण में किया गया खर्च किसके खाते में जाएगा?

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ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जनता का हवाला देने वाले अरविंद केजरीवाल ने हर फैसले पर उनकी राय नहीं ली हो। इससे पहले भी ऐसे कई मौके आएं, जहां उन्हें जनता की राय लेनी चाहिए थी, पर उन्होंने नहीं ली। उनमें से एक है : मंत्रियों की घोषणा। जनता की राय पर मुख्यमंत्री बनने वाले अरविंद केजरीवाल ने यह उचित नहीं समझा कि मंत्रियों के चयन के लिए भी उन्हें जनता की राय लेनी चाहिए।

विधायकों को इनोवा कार

आम जनता की तरह ही रहने का दावा करने वाले अरविंद केजरीवाल के विधायकों ने सरकारी लग्जरी कार इनोवा लेने में भी देरी नहीं की। इसके लिए भी जनता की राय नहीं ली गई। विपक्ष द्वारा सवाल करने पर बचाव का बयान भी दे दिया कि लाल बत्ती से इंकार किया गया था, सरकारी गाड़ी लेने से नहीं।

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