जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। नोटबंदी के दौरान राजनीतिक दलों को अपने खाते में पुराने नोट जमा करने पर कोई पाबंदी नहीं लगाने को ले कर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इससे राजनीतिक दलों को काला धन सफेद बनाने का लाइसेंस मिल जाएगा। जबकि वित्त मंत्रालय ने बयान जारी कर सफाई दी है। इसमें उसने कहा है कि राजनीतिक दलों के खातों पर नजर रखने के लिए आय कर कानून में पर्याप्त प्रावधान हैं।

वित्त मंत्रालय ने शनिवार को भी जारी अपने बयान में माना है कि राजनीतिक दल अपने खाते में जितनी संख्या में चाहें पुराने नोट जमा कर सकते हैं। साथ ही यह भी माना है कि अगर राजनीतिक दल ये दावा करें कि उनको मिली सारी रकम उन्हें आठ नवंबर से पहले 20-20 हजार रुपये से कम के चंदे के तौर पर मिली हैं तो उन्हें इसको ले कर कभी कोई ब्योरा नहीं देना होगा।

राजनीतिक पारदर्शिता के लिए लगातार सक्रिय रहने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफा‌र्म्स (एडीआर) के संस्थापक जगदीक छोकर कहते हैं, 'इस तरह तो राजनीतिक दलों को काला धन सफेद करने के लिए आपने अधिकृत कर दिया। अब चाहे तो कोई व्यक्ति किसी पार्टी को अपना दस करोड़ रुपये का काला धन दे दे। कुछ समय बाद वह पार्टी को अलग-अलग बिल जारी कर चेक से वही रकम वापस ले ले।'

उधर, वित्त मंत्रालय का कहना है कि अगर राजनीतिक दलों ने कोई गड़बड़ी की तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई के लिए आय कर कानूनों में पर्याप्त प्रावधान हैं। मगर इस बारे में छोकर कहते हैं कि जब देश में एक नई परिस्थिति बनी है जिसमें पुराने नोट जमा करने को ले कर तमाम तरह की सख्ती की गई हैं तो फिर राजनीतिक दलों को छूट क्यों? साथ ही वे कहते हैं, 'आय कर की धारा 13 ए में राजनीतिक दलों पर अंकुश के प्रावधान जरूर हैं, लेकिन यह सिर्फ कहने भर को है। किसी आय कर अधिकारी की हिम्मत नहीं होती कि वह पार्टियों के खातों पर हाथ डाले। सभी जानते हैं कि राजनीतिक दल काले धन पर ही चलती हैं। यह बात क्या वित्त सचिव को नहीं पता।'

मौजूदा प्रावधानों का फायदा उठाते हुए राजनीतिक दल अपनी अधिकांश आय का खुलासा नहीं करते। पार्टियां दावा करती हैं कि यह रकम उन्हें 20 हजार रुपये से कम के चंदे में मिली हैं। प्रावधानों के मुताबिक चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड राजनीतिक दलों को आय कर से तो छूट हासिल है ही उन्हें सिर्फ उन दानदाताओं की सूची आयोग को सौंपनी होती है, जिन्हें 20 हजार रुपये से ज्यादा दिए हों। नोटबंदी लागू होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी मौजूदा स्थिति से असंतोष जताया था। उन्होंने संसद के शीतकालीन सत्र शुरू होने के पहले बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी दलों से अपील की थी कि वे सर्वसम्मति से राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता का रास्ता तैयार करें।

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