सतीश प्रभु। सामान्य तौर पर सेवा से अवकाश प्राप्ति के पश्चात का जीवन व्यक्ति बिना किसी बंधन के जीने की चाहत रखता है। परंतु यह उतना आसान नहीं होता जितना वह सोचता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि उसकी आमदनी का माध्यम लगभग समाप्त हो जाता है। बुजुर्ग अवस्था में जीवन में आने वाली समस्याओं का हल करने के लिए पर्याप्त रकम होना आवश्यक है। ऐसे में यदि उसने अपने सक्रिय जीवन के दौरान समुचित धन का प्रबंधन कर लिया हो, तो उसे अधिक मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यक्ति की कमाई के वर्षों में जितनी अधिक रिटायरमेंट बचत जमा होगी, अवकाश प्राप्ति के बाद का उसका जीवन उतना ही आसान होगा। लगभग 60 साल की उम्र में रिटायर होने तक औसतन लगभग 35 साल का करियर होता है।

चिकित्सा विज्ञान में प्रगति और जीवन प्रत्याशा बढ़ने के कारण यह 90 वर्ष तक पहुंच गई है। इसका अर्थ यह है कि एक औसत व्यक्ति को रिटायरमेंट के बाद के लगभग 30 वर्षों की योजना बनाने की आवश्यकता है। इसमें सबसे बड़ा अंतर यह है कि एक नौकरीपेशा व्यक्ति के करियर के 35 साल वेतन के साथ थे, जबकि अब रिटायरमेंट के 30 साल बिना वेतन के होंगे। एक और विरोधाभास मुद्रास्फीति के कारण है।

मान लीजिए कि 40 साल की उम्र में मासिक खर्च एक लाख रुपये था, 60 साल की उम्र में पांच प्रतिशत की मुद्रास्फीति के कारण वही खर्च ढाई लाख रुपये और 80 साल की उम्र में सात लाख रुपये और 90 साल की उम्र में 11 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। संक्षेप में कहें तो मुद्रास्फीति के कारण आगामी वर्षों में खर्च िनरंतर बढ़ने की आशंका है। ये संख्याएं काल्पनिक लग सकती हैं, लेकिन अगर मुद्रास्फीति पांच प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ती है तो वह वास्तविकता के लगभग निकट होगी। इसलिए हमें एक बड़ा कोष बना कर रखना चाहिए जो मुद्रास्फीति से बचे रहने के साथ-साथ हमारे स्वर्णिम वर्षों को भी जीवंत बनाए रखे।

बचत का समुचित प्रबंधन

पर्याप्त सेवानिवृत्ति कोष बनाने के लिए दो प्रमुख स्तंभ हो सकते हैं। पहला, जल्दी निवेश शुरू करना और दूसरा इक्विटी म्यूचुअल फंड में निवेश करना। इसमें पहला आपकी बचत राशि को लंबी अवधि में संयोजित करने में मदद करता है, जबकि दूसरा उच्च रिटर्न उत्पन्न करने की क्षमता के कारण मुद्रास्फीति से लड़ने में मदद कर सकता है। उदाहरण के लिए, एक 25 वर्षीय व्यक्ति 60 वर्ष की आयु तक पांच करोड़ रुपये से अधिक की सेवानिवृत्ति कोष बनाने में सक्षम हो सकता है, जो कि 12 प्रतिशत प्रति वर्ष का रिटर्न मानकर इक्विटी म्यूचुअल फंड में व्यवस्थित निवेश योजनाओं (एसआइपी) के माध्यम से 10 हजार रुपये मासिक निवेश से आरंभ कर सकता है।

अगर एसआइपी में सालाना पांच प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाती है, तो यह कोष बढ़कर पांच करोड़ रुपये से ज्यादा हो सकता है। परंतु इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इस कोष के गठन और उसमें किए जाने वाले अंशदान में जितनी देरी की जाएगी, अवकाश प्राप्ति के पश्चात प्राप्त होने वाली रकम उतनी ही कम होती जाएगी। चिकित्सा बीमा : एक मजबूत कोष बनाना रिटायरमेंट योजना का केवल एक हिस्सा है। आपको चिकित्सकीय रूप से बीमा कराने की भी आवश्यकता है, ताकि स्वास्थ्य संबंधी बड़ा खर्च बीमा कंपनी द्वारा वहन किया जाए, न कि आपके कोष से खर्च किया जाए।

एसआइपी की तरह, यहां भी कम उम्र में बीमा कराने से प्रीमियम को अनुकूलित करने में मदद मिलती है। रिटायरमेंट योजना का तीसरा भाग यह सुनिश्चित करना है कि आपका कोष रिटायरमेंट के बाद कम से कम 30 वर्षों तक बने रहने में सक्षम हो और अंतिम सांस तक आपका साथ दे। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए, रिटायरमेंट के बाद भी इक्विटी म्यूचुअल फंड में जोखिम लेने की क्षमता के अनुसार पोर्टफोलियो का आंशिक आवंटन मुद्रास्फीति को मात देने में मददगार साबित हो सकता है। वैसे संगठित क्षेत्र में कार्य करने वाले अधिकांश लोगों को केंद्र सरकार के नियंत्रण में संचालित कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के माध्यम से भी बचत का विकल्प उपलब्ध होता है, परंतु इसमें होने वाली बचत की भी एक सीमा होती है।

ऐसे में नौकरीपेशा या फिर कोई छोटा-मोटा कारोबार करने वाले व्यक्ति को भी वृद्धावस्था की आवश्यकताओं के लिए कुछ तो बचत करनी ही चाहिए। इस संबंध में एक तथ्य यह भी है कि इस उद्देश्य से की जाने वाली बचत को जितना जल्दी आरंभ कर दें, उतना अच्छा होगा। इसके लिए म्यूचुअल फंड के माध्यम से निवेश आरंभ किया जा सकता है। आपकी वित्तीय स्वतंत्रता के लिए यह आवश्यक भी है।

[प्रमुख-कंटेंट डेवलपमेंट, फ्रैंकलिन टेंपलटन]

Edited By: Sanjay Pokhriyal