गिरिजा कुमार ठाकुर, अंबिकापुर। इंसान क्षणिक आवेश में आकर कई बार ऐसी गलती कर बैठता है जो उसकी जिंदगी बदल देती है। इस गलती के बाद कानून की नजर में वह गुनहगार होता है और उसे बतौर सजा जेल भेजा जाता है। जेल एक ऐसी जगह है जो अपराध की दुनिया में गलती से चले गए लोगों को वापस समाज की मुख्यधारा में लौटने का मौका देती है। एक कैदी जब जेल से अपनी सजा पूरी करके निकलता है तो उसमें कई सकारात्मक बदलाव नजर आते हैं। छत्तीसगढ़ के अम्बिकापुर शहर का केंद्रीय कारागार कई मायनों में भटके हुए लोगों को वापस सकारात्मकता के रास्ते पर लौटने का अवसर दिला रहा है। यहां का पूरा माहौल कलामय है और इस माहौल में कई कैदी कला के जरिए माथे पर लगा अपराध का कलंक धो रहे हैं।

अम्बिकापुर जेल का माहौल किसी जेल की तरह नहीं बल्कि एक आर्ट वर्कशॉप की तरह नजर आता है, जहां हर कोई अपने हुनर को तराशने में लगा है। एक समय अपराध अपराध के चंगुल में फंसकर माथे पर अपराधी का कलंक लगा बैठे लोग अब इस कलात्मक माहौल में ढलकर अपनी जिंदगी बदल रहे हैं और सुनहरे भविष्य का सपना बुन रहे हैं। यहां निरुद्ध बंदियों की संख्या लगभग 24 सौ है। इनमें से 18 सौ सजायाफ्ता हैं। जेल मैनुअल के अनुसार इन बंदियों में से 20 फीसद का उपयोग विभिन्न् क्रियाकलापों में किया जाता है। इनमें कई कलात्क गतिविधियां जैसे काष्ठ कला, बेंत कला, पेंटिंग आदि शामिल हैं।

कला के सहारे आर्थिक आत्मनिर्भरता

इसी क्रम में जेल में रहने वाले बंदियों को उनकी रुचि के अनुरूप जेल के कारखाने में काम मिल रहा है। जिससे जेल को तो राजस्व मिल ही रहा है साथ ही 229 बंदी कुशल व अकुशल श्रमिक की श्रेणी अनुरूप काम करते हुए अच्छी खासी आय भी अर्जित कर रहे हैं। बीते वर्ष जहां जेल को लगभग 30 लाख रुपये की आय हुई, वहीं चालू वर्ष 2017-18 में 50 लाख रुपये आय का लक्ष्य जेल प्रबंधन ने रखा है।

            

लकड़ी पर करते हैं ऐसी नक्काशी, देखकर दंग हैं लोग

केंद्रीय जेल का ऐसा ही एक बंदी करीमन काष्ठकला में माहिर है। बांस की तीलियों से आकर्षक नक्काशी करने वाले हीरा की कला ने जेल अधिकारियों का भी दिल जीत लिया है। पेंटिंग सहित अन्य कला में भी बंदी माहिर हैैं। काष्ठकला में माहिर करीमन पेड़ की जड़ को ऐसा आकार देने में लगा है, जिसका कार्य पूरा होने के बाद इसका उपयोग डाइनिंग टेबल की तरह किया जा सकता है। हीरा की अदाकारी भी कम नहीं है। उनके द्वारा तैयार बांस की कलाकृतियां बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेती हैं।

           

अपनी कमाई से संवार रहे बच्चों का भविष्य

बंदियों के द्वारा यहां सिलाई, डिटर्जेंट बनाने, प्रिंटिंग वर्क जैसे कार्य किए जा रहे हैं। जेल प्रबंधन को बंदियों के द्वारा बनाई गई सामग्री में से सर्वाधिक आय काष्टकला से हो रही है। जेल प्रबंधन की ओर से ऐसे बंदियों को चिन्हित किया गया है जो कुशल अकुशल की श्रेणी में है। इनके हुनर से जहां जेल प्रबंधन की आय बढ़ी है, वहीं बंदियों के खाते में भी अच्छी खासी रकम जमा हो रही है। जेल में होने वाली कमाई से लोन लेकर कई बंदी अपने बच्चों की फीस अदा कर रहे हैं। कई बंदी अपने बीमार परिजनों का इलाज, मांगलिक कार्यक्रम का खर्च जेल में रहते हुए वहन कर रहे हैं। कला में पारंगत इन बंदियों के कार्य व्यवहार से बंदियों का रुझान जेल में रहते माहिर बनने और सजा काटकर बाहर आने के बाद बेहतर जीवन यापन की ओर बढ़ रहा है।

Posted By: Ravindra Pratap Sing