जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। न्यूजप्रिंट की अप्रत्याशित बढ़ती कीमतों की मार झेल रहे अखबारों के प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से मदद की मांग की है। इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के बैनर तले आठ सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने सूचना व प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी से मिलकर कहा कि सरकारी विज्ञापन की दरों में बढ़ोतरी कर अखबारों को फौरी तौर पर राहत मुहैया कराने की सख्त जरूरत है। ईरानी ने प्रतिनिधिमंडल की मांगों पर विचार करने का आश्वासन दिया।

-पिछले एक साल में न्यूजप्रिंट की कीमतों में 40 फीसदी की उछाल

- पांच साल से नहीं हुआ है डीएवीपी के विज्ञापन दर में बदलाव

पिछले एक साल में न्यूजप्रिंट की कीमत में 40 फीसद की उछाल आई है। जाहिर है कि ऐसे में अखबार का प्रकाशन भारी दबाव में है। दरअसल अखबार की लागत का 60 फीसद खर्च अकेले न्यूजप्रिंट पर आता है। आसमान छूती कीमत के बीच स्थिति ऐसी हो गई है कि अखबार अपने उत्पादन कीमत का आधा भी उसे बेचकर नहीं उगाह पाता है। स्थिति इसलिए ज्यादा मुश्किल है क्योंकि मजबूरी में कीमत बढ़ाई जाए तो अखबार का मूल ध्येय ही कम होता है।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अखबार सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक मुद्दों पर जनता को जागरुक बनाता है। कीमत बढ़ाने से बोझ जनता पर तो पड़ेगा ही, कहीं न कहीं जागरुक लोकतंत्र की राह भी अवरुद्ध होगी। अगर उससे राहत का रास्ता नहीं ढूंढा जाता है तो अखबारों के लिए समस्या बढ़ती है।

गौरतलब है कि न्यूजप्रिंट की कीमतें अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है। हालत यह है कि जो न्यूजप्रिंट पिछले साल तक 33 हजार रुपये प्रति टन मिल रहा था, वह आज 52 हजार रुपये प्रति टन पहुंच गया है। यानी एक साल के भीतर कीमतों में लगभग 40 फीसदी का इजाफा हो गया है। देश में न्यूजप्रिंट की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के पीछे असली वजह आयातित न्यूजप्रिंट है।

दरअसल दुनिया में सबसे अधिक अखबारों का प्रकाशन करने वाले भारत में न्यूजप्रिंट की आधी जरूरतें आयात से पूरी होती है। भारत में हर साल 28 लाख टन न्यूजप्रिंट की खपत होती है, जबकि उत्पादन सिर्फ 14 लाख टन का ही होता है। यूरोप में कई न्यूजप्रिंट उत्पादन करने वाली कंपनियों के बंद होने और चीन में रद्दी कागज के आयात पर प्रतिबंध लगने के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में न्यूजप्रिंट की कीमत बढ़ गई।

चीन में न्यूजप्रिंट का उत्पादन बंद हुआ तो उसकी भरपाई भी यूरोप से होने लगी जिसके कारण कीमत का बोझ और बढ़ा। हालत गंभीर इसीलिए भी हो गई क्योंकि आयातित न्यूजप्रिंट की बढ़ती कीमतों को देखते हुए देशी उत्पादकों ने भी न्यूजप्रिंट की कीमतें बढ़ा दी।

इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी के अध्यक्ष अकिला उरांकर के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने स्मृति इरानी को बताया कि जिस तरह से न्यूजप्रिंट के दाम बढ़ रहे हैं और विज्ञापन की दरें पहले जैसी ही हैं, उसमें अखबार निकालना संभव नहीं है। सरकारी विज्ञापन की दरों में संशोधन कर मदद आसानी से की जा सकती है।

गौरतलब है कि डीएवीपी से मिलने वाले सरकारी विज्ञापन की कीमत यूं तो अखबारों के सर्कुलेशन पर आधारित होती है लेकिन पिछले पांच साल से उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। आखिरी बार यह अक्टूबर 2013 में रिवाइज हुआ है। यानी अखबारों की उत्पादन कीमत तो काफी बढ़ गया लेकिन आय का स्त्रोत वहीं स्थिर है।

 

Posted By: Bhupendra Singh