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'प्रेस की आजादी पर हमला', DPDP एक्ट के खिलाफ डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन की SC में याचिका

Published: Tue, 27 Oct 2026 10:29 AM (IST)

डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के कई प्रविधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

DPDP एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

DPDP एक्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

HighLights

  1. DNPA ने DPDP एक्ट के कई प्रविधानों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती।

  2. प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन बताया।

  3. पत्रकारिता के सामान्य कामकाज को असंभव बनाने का आरोप लगाया।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) सरकार ने बनाए नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

एसोसिएशन ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट के कई प्रविधानों और सरकार द्वारा बनाए गए नियमों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

एसोसिएशन का कहना है कि पब्लिशर्स, संपादकों, रिपोर्टरों और संवाददाताओं को अब 'नोटिस और पूर्व सहमति', 'डेटा मिटाने के लिए मजबूर करने' और 'सत्यापन योग्य सहमति' (verifiable consent) जैसी शर्तों के दायरे में लाया जा रहा है। ये ऐसी जिम्मेदारियां हैं जिनका पालन करते हुए प्रेस का सामान्य कामकाज संभव नहीं है।

एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में की याचिका दायर

भारत के 21 प्रमुख मीडिया संगठनों का प्रतिनिधित्व करने वाली इस एसोसिएशन ने अपनी याचिका में कहा है, 'हमारी मांग है कि DPDP एक्ट की धारा 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37, 44(3) और धारा 40 के तहत बनाए गए DPDP नियमों (नियम 16, 17 और 23) को अमान्य घोषित किया जाए, क्योंकि ये संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के खिलाफ हैं।'

याचिका में कहा गया है, 'ऊपर बताई गई धाराएं पत्रकारिता के काम को डेटा प्रोसेसिंग की एक अलग श्रेणी के रूप में कोई छूट नहीं देतीं, जबकि संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(a) के तहत इसे संवैधानिक सुरक्षा मिलनी चाहिए।'

याचिका में आगे बताया गया, 'ये धाराएं पत्रकारों, ग्राउंड रिपोर्टरों, आम नागरिकों, व्हिसलब्लोअर्स, RTI कार्यकर्ताओं और अन्य संबंधित लोगों द्वारा किए जाने वाले पत्रकारिता कार्यों के लिए खतरा हैं। ये हमारे लोकतांत्रिक ढांचे की नींव पर प्रहार करती हैं और संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ हैं।'

एक्ट की धारा 44(3) पर सवाल उठाते हुए याचिका में कहा गया है, 'यह व्यक्तिगत जानकारी की हर श्रेणी को खुलासे के दायरे से बाहर कर देती है, भले ही वह जानकारी किसी सार्वजनिक गतिविधि से ही क्यों न जुड़ी हो।'

याचिका के अनुसार, 'यह उस संतुलन को खत्म कर देती है जो पिछले दो दशकों से 'निजता के अधिकार' (right to privacy) और 'सूचना के अधिकार' (right to information) के बीच बना हुआ था।'

याचिका में आगे कहा गया है, 'इन प्रविधानों को एक साथ देखा जाए तो, ये अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मान्यता प्राप्त 'वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के मौलिक अधिकार, तथा 'जानने और सूचना तक पहुंचने' के निहित अधिकार पर एक असंगत और अत्यधिक प्रतिबंध लगाते हैं।'

याचिका में साफ तौर पर दावा किया गया है, 'DPDP अधिनियम समाचारों के प्रसार के संदर्भ में, वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर पाबंदियां लगाता है।'

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