जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने संविधान दिवस के मौके पर शनिवार को क्षमता से अधिक भरी जेलों और वहां बड़ी संख्या में बंद कैदियों के प्रति चिंता जताते हुए सरकार और न्यायपालिका से उनके लिए कुछ करने की अपील की। राष्ट्रपति ने जेलों के अत्यधिक भरने पर और ज्यादा जेलें बनाए जाने की चर्चाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि हम विकास की ओर जा रहे हैं, आगे जा रहे हैं ऐसे में और ज्यादा जेल बनाने की क्या जरूरत है? जेल कम करनी चाहिए।

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राष्ट्रपति ने संविधान के सिद्धांत वाक्य का किया उल्लेख

राष्ट्रपति ने लोगों का, लोगों के लिए, लोगों के द्वारा संविधान के सिद्धांत वाक्य का उल्लेख करते हुए कहा कि हम लोगों के लिए हैं, लोगों के द्वारा है, इसलिए लोगों के लिए सोचना हम लोगों का काम है। उन्होंने इस दिशा में मिलकर सोचने और कुछ करने की अपील करते हुए कहा कि सारा कुछ आप पर छोड़ती हूं। इस तरह राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में न्यायपालिका और कार्यपालिका को अपनी भावना से अवगत कराया। राष्ट्रपति ने ये बातें शनिवार को संविधान दिवस पर सुप्रीम कोर्ट में आयोजित समारोह के समापन भाषण में कहीं। उनका आज का बयान इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि कुछ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कानूनी मदद के इंतजार में जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों के बारे में चिंता जताते हुए न्यायपालिका से उनकी रिहाई की प्रक्रिया में तेजी लाने की अपील की थी।

कैदियों की दशा पर जताई चिंता

राष्ट्रपति ने छोटे-मोटे अपराधों में वर्षों से जेल काट रहे विचाराधीन कैदियों की दशा पर चिंता जताते हुए कहा कि कौन लोग जेल में हैं। वो लोग हैं जिन्होंने ने थोड़ी बहुत मारपीट की या कुछ किया और उन पर क्या-क्या धाराएं लगा दीं, जो लगना नहीं चाहिए थीं। वो वर्षों जेल में बंद रहते हैं। उन्हें छुड़ाया नहीं जाता क्योंकि जो कुछ घर में बचा है यानी जमीन जायदाद, बर्तन आदि सब खत्म हो जाएंगे। इसलिए परिजन उन्हें छुड़ाने नहीं जाते। उन लोगों के लिए कुछ करना चाहिए। वे गुनहगार हैं कि नहीं, इसका ट्रायल अभी चल रहा है। मुर्मु ने कहा कि जो लोग जेल में बंद हैं, उन्हें न तो मौलिक अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में पता है और न ही संविधान की प्रस्तावना के बारे में। ऐसे लोगों के लिए कुछ करने की जरूरत है।

राष्ट्रपति ने कैदियों की परेशानियों को किया साझा

राष्ट्रपति ने पूर्व में अन्य पदों पर रहने के दौरान के जेलों में दौरे और बंदियों से मिलने और उनकी परेशानियों को समझने के अनुभव भी साझा किए। उन्होंने कहा कि ये लोग सरकार पर भी बोझ हैं। अब मानवाधिकार भी है, इनका कौशल विकास किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वैसे ये भी बाहर नहीं आना चाहते क्योंकि बाहर का समाज इन्हें बुरा समझता है। राष्ट्रपति ने समारोह में मौजूद न्यायपालिका और सरकार के नुमाइदों कानून मंत्री और न्यायाधीशों से कहा कि वे इस मसले को उन पर छोड़ रही हैं। सरकार के जो तीन अंग हैं विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका है, जन साधारण और देश के लिए कहीं-कहीं इन तीनों की सोच एक होनी चाहिए। चेक एंड बैलेंस तो होना चाहिए लेकिन कहीं-कहीं हम सबको मिलकर काम करना चाहिए।

परेशानी में याद आते हैं डाक्टर और वकील

राष्ट्रपति ने कहा कि गांव में लोग शिक्षक, डाक्टर और वकील को भगवान समझते हैं। डाक्टर और वकील के पास व्यक्ति परेशानी में जाता है। राष्ट्रपति ने संविधान में सरकार के तीनों अंगों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के कार्य और शक्तियों के बंटवारे और सीमा रेखा का भी जिक्र किया। कहा कि तीनों को संविधान में तय सीमा रेखा का सम्मान करना चाहिए।

न्याय का पहला बिंदु हैं जिला अदालत

सीजेआइ सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्यायपालिका की प्रगति, डिजिटलीकरण और न्याय सुगम करने की दिशा में किए गए प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ये जरूरी है कि न्यायपालिका लोगों तक पहुंचे और लोगों से न्यायपालिका तक पहुंचने की अपेक्षा न करे। उन्होंने कहा कि कोरोनाकाल में तकनीक का जो बुनियादी ढांचा तैयार हुआ है, उसे नष्ट नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आगे बढ़ाया जाना चाहिए। सीजेआइ ने कहा कि न्याय तक पहुंच का पहला बिंदु जिला अदालतें है। इसलिए उन्हें मजबूत करना और ऊपर उठाना होगा। उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी की प्रक्रिया को नागरिक केंद्रित बनाने के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकी को बढ़ाया जाना चाहिए। साथ ही कहा कि यह महत्वपूर्ण है कि कानूनी पेशे और न्यायपालिका में वंचित समुदायों और महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाए। अटार्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने कहा कि उन वैधानिक प्रविधानों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए जो विभिन्न ट्रिब्यूनल के आदेशों को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हैं, इससे सुप्रीम कोर्ट में भार बढ़ता है।

जिला अदालतों के स्तर पर काफी काम करने की जरूरत

कानून मंत्री कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि न्यायपालिका और कार्यपालिका ने आपसी तालमेल से मिलजुल कर प्रयास कर न्याय सुगम बनाने के लिए बहुत से काम किए हैं। कीर्तिमान स्थापित किए है लेकिन काफी कुछ अभी करना है। केसों का बोझ खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्टों में काफी काम किया है लेकिन जिला अदालतों के स्तर पर भी काम करना होगा। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में 70 हजार केस लंबित हैं और हाई कोर्ट में 70 लाख, लेकिन लंबित मुकदमों का ज्यादातर हिस्सा जिला अदालतों में लंबित है। लंबित मुकदमो की संख्या पांच करोड़ पहुंच रही है। उन्होंने बताया कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता में भारतीय भाषा समिति बनी है जो क्षेत्रीय भाषा में कानूनी शब्दावली तैयार करने पर काम कर रही है।

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Edited By: Amit Singh

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