नई दिल्ली, जयप्रकाश रंजन। सात वर्षों तक देश के दूसरे सबसे बड़े बैंक(पंजाब नेशनल बैंक) की एक ही शाखा में गड़बड़ी होती रही, लेकिन इसकी भनक बैंकिंग सेक्टर के सबसे बड़े नियामक एजेंसी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया(आरबीआइ) को नहीं लगी। अब जब पीएनबी में उद्योगपति नीरव मोदी और उसकी कंपनियों की तरफ से किये गये घोटाले की परत खुलने लगी है, तो सवालों के घेरे में आरबीआइ भी है। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने इस बारे में आरबीआइ को पत्र लिख कर पूछा है कि आखिर इतना बड़ा मामला किस तरह से उनकी नजर से बचा रह गया? आरबीआइ से पूछा गया है कि किन वजहों से यह गड़बड़ी हुई है।

वित्त मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, 'पीएनबी में किये गये फ्राड ने पूरे बैंकिंग तंत्र को लेकर जो सवाल उठाये हैं, उनकी समीक्षा की जानी जरुरी है। यह समीक्षा आरबीआइ ही करेगा, क्योंकि निगरानी तंत्र की जिम्मेदारी भी उसी की है। यही वजह है कि आरबीआइ को पत्र लिख कर यह सवाल किया गया है कि आखिर चूक कहां हुई है।' वित्त मंत्रालय को अब इस बात का एहसास हो रहा है कि बैंकों के काम काज खास तौर पर विदेशों से होने वाले लेन देन को लेकर जिस तरह की अभी निगरानी व्यवस्था है वह कमजोर है। उसी का फायदा नीरव मोदी व उसके सहयोगियों ने उठाया है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतने लंबे अर्से तक यह घोटाला नहीं चलता।

वित्त मंत्रालय को यह शक इसलिए भी हुआ है, क्योंकि बैंकों के विदेशों से होने वाले लेन-देने की निगरानी को लेकर आरबीआइ के साथ लगातार विचार विमर्श होता रहा है। अभी तक पीएनबी की तरफ से जो बातें इस घोटाले को लेकर बताई जा रही है, उसको भी सरकार शक की नजर से देख रही है। खास तौर पर स्विफ्ट तकनीकी से हस्तांतरित होने वाली सूचना (लेंटर ऑफ अंडरटेकिंग) के दर्ज नहीं होने का तर्क सरकार के गले भी नहीं उतर रहा है। अगर यह मान भी लिया जाए कि पीएनबी के कुछ अधिकारियों की मिली भगत से उनके कोर बैंकिंग सिस्टम में इसे दर्ज नहीं करने की साजिश रची गई है, तब भी दूसरे बैंकों के सिस्टम में इस लेन देन पर निगरानी करने वाली एजेंसियों की निगाह कैसे नहीं पड़ी। ऐसे में आने वाले दिनों में जांच एजेंसियां पीएनबी व इस घोटाले में फंसे अन्य बैंकों के खातों की जांच करने वाले आडिटर्स की भूमिका की भी जांच पड़ताल कर सकती हैं।

वित्त मंत्रालय में कोई भी यह बात मानने को तैयार नहीं है कि एलओयू जारी करने की प्रक्रिया को लगातार कई वर्षों तक छिपा कर रखा जा सकता है। उक्त सूत्रों के मुताबिक, एलओयू को जारी करने की व्यवस्था ही ऐसी है कि उसके लिए उपर तक मंजूरी लेने की जरूरत होती है। ऐसे में अगर जांच के लपेटे में बैंक के शीर्ष अधिकारी भी आ जाएं तो आश्चर्य नहीं। बैंक के शीर्ष प्रबंधन को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि जब आरबीआइ के दिशानिर्देश के मुताबिक, एक संवेदनशील पद पर किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति तीन वर्षों से ज्यादा नहीं होनी चाहिए तब पीएनबी की दक्षिण मुंबई स्थित शाखा में एक ही कर्मचारी को वर्षों तक कैसे रहा। जबकि उस शाखा से सबसे ज्यादा एलओयू जारी किये जाते थे। सनद रहे कि सतर्कता आयोग की तरफ से सोमवार को बैंकों को कहा गया है कि वे संवेदनशील पदों पर किसी भी कर्मचारी को तीन वर्षो से ज्यादा नहीं रखे।

By Tilak Raj