नई दिल्ली, एजेंसियां। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 31 अक्टूबर को सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिन के अवसर पर गुजरात में पहली सी-प्लेन सेवा का आगाज करेंगे। अहमदाबाद के साबरमती फ्रंट से नर्मदा जिले के केवडिया कॉलोनी स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तक शुरू हो रही इस सेवा के पहले दिन पीएम मोदी भी सफर करेंगे। उड़ान योजना के तहत स्पाइसजेट रोजाना दो सी-प्लेन फ्लाइट का संचालन करेगी। करीब आधे घंटे की इस उड़ान के लिए यात्रियों को एक तरफ से लगभग 1,500 रुपये खर्च करने होंगे। सी-प्लेन सेवा से भारतीय पर्यटन को नया आधार मिलेगा।

अहमदाबाद पहुंचा विमान

जहाजरानी मंत्रालय से जुड़े सूत्रों ने बताया कि ट्विन ऑट्टर 300 सी-प्लेन अहमदाबाद रिवर फ्रंट पर पहुंच चुका है। इसका वजन 3,377 किलो है और इसमें 1,419 लीटर तक ईंधन भरा जा सकता है। विमान की लंबाई 15.77 मीटर और ऊंचाई 5.94 मीटर है। यह 5,670 किलो वजन ढो सकता है। इसमें 19 यात्री सफर कर सकते हैं। पीटी61-32 इंजन वाले इस विमान को उड़ान के दौरान प्रति घंटे 272 लीटर ईंधन की जरूरत होती है। यह अन्य विमानों के मुकाबले काफी कम ऊंचाई पर उड़ सकता है।

क्या है सी-प्लेन

सी-प्लेन के विकास का श्रेय ऑस्ट्रेलिया के विल्हेम क्रेस को जाता है, जिन्होंने वर्ष 1898 में 30 हॉर्स पावर इंजन वाला विमान बनाया। 28 मार्च, 1910 को पहली बार फ्रांस के हेनरी फैब्रे ने पावर वाले सी-प्लेन को सफलतापूर्वक उड़ाया। सितंबर 1919 में ब्रिटिश कंपनी सुपरमरीन ने सी-प्लेन का परिचालन शुरू किया। इस प्रकार के विमान छोटे जल निकायों व छोटी हवाईपट्टी से उड़ान भरने व लैडिंग में सक्षम हैं।

2017 से चल रहा ट्रायल

सी-प्लेन का ट्रायल वर्ष 2017 से चल रहा है। पहले चरण के तहत जमीन से उड़ान भरने वाले विमानों का ट्रायल नागपुर से गुवाहाटी के बीच किया गया। दूसरे चरण के तहत एंफीबियस विमान का ट्रायल गिरगांव चौपाटी पर किया गया। इस प्रकार के विमान धरती और पानी दोनों से उड़ान भरने व लैंडिंग में सक्षम हैं। स्पाइसजेट अब तक 18 सी-प्लेन रूट का अधिकार हासिल कर चुकी है।

यहां भी संभावनाएं

पूर्वोत्तर, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, अंडमान, लक्षद्वीप व अन्य समुद्री इलाकों में भी सी-प्लेन परियोजना की संभावनाओं को टटोला जा रहा है।

केरल में भी लांच हुई थी योजना

केरल टूरिज्म इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने दो जून, 2013 को कोल्लम में सी-प्लेन परियोजना की शुरुआत की थी। हालांकि, इसका व्यावसायिक परिचालन स्थानीय मछुआरों के विरोध के कारण संभव नहीं हो सका। अंडमान व निकोबार में 30 दिसंबर, 2010 को व्यावसायिक सी-प्लेन योजना की शुरुआत पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर की गई है।

द्वितीय विश्वयुद्ध में रही भूमिका

सी-प्लेन वर्ष 1930 के आसपास अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका व एशिया में लोकप्रिय हो गए थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान भी इनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। इसी दौरान जर्मनी ने सबसे भारी सी-प्लेन यानी फ्लाइंग बोट का निर्माण किया था।

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