परिसीमन और महिला आरक्षण बिल पास कराने की तैयारी, सितंबर में बुलाया जा सकता है संसद का विशेष सत्र
सितंबर के पहले हफ्ते में महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पारित कराने के लिए संसद का सत्र बुलाया जा सकता ...और पढ़ें

सितंबर में बुलाया जा सकता है संसद का विशेष सत्र (फाइल फोटो- ANI)
HighLights
सितंबर के पहले हफ्ते में संसद सत्र संभव।
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पर चर्चा।
अंतरराष्ट्रीय बैठकों के कारण सत्र में देरी।
नीलू रंजन, जागरण। नई दिल्ली। हंगामे और शोर शराबे की भेंट चढ़ चुके संसद के मानसून सत्र को सितंबर के पहले हफ्ते में फिर से बुलाया जा सकता है। एससीओ, ब्रिक्स और संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों को देखते हुए सितंबर पहले हफ्ते में इसे बुलाने के संकेत मिल रहे हैं।
2029 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण सुनिश्चित करने के लिए सरकार परिसीमन विधेयक को पास कराना जरूरी बता रही है। ध्यान देने की बात है कि अभी तक मानसून सत्र का विधिवत समापन नहीं हुआ है और 13 अगस्त को इसको अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया गया था।
दरअसल, प्रधानमंत्री मोदी एससीओ की बैठक के लिए 30 अगस्त को किर्गिस्तान जा रहे हैं, जहां से वे तीन सितंबर को वापस लौटेंगे। इसके बाद 12-13 सितंबर को दिल्ली में बिक्स देशों की नई दिल्ली में बैठक होगी, सभी ब्रिक्स देशों के राष्ट्राध्यक्षों के उपस्थित रहने की उम्मीद है।
सितंबर के तीसरे हफ्ते में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक होगी। वैसे इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका जाने का फैसला अभी नहीं हुआ है। ऐसे में सितंबर का पहला हफ्ता महिला आरक्षण और परिसीमन से विधेयक को पास कराने के लिए संसद सत्र बुलाने के लिए उपयुक्त बताया जा रहा है।
मानसून सत्र की तरह सरकार ने बजट सत्र का भी समापन नहीं किया था और बाद में 16 से 18 अप्रैल तक तीन दिनों का सत्र बुलाकर इन विधेयकों को पास कराने की कोशिश की थी, जो सफल नहीं हो सकी है।
मानसून सत्र के दौरान ही सरकार की ओर से संविधान संशोधन से जुड़े इन विधेयकों को पास कराने के लिए जरूरी दो-तिहाई से अधिक 366 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। लोकसभा की मौजूदा सदस्य संख्या 540 है और उसके दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी।
सरकार की ओर से समर्थन करने वाली पार्टियों का विवरण नहीं दिया गया है। लेकिन एनसीपी (शरद पवार गुट) और डीएमके समेत कई दलों के विधेयक के समर्थन में आने की सत्ता पक्ष की ओर से संकेत दिए जा रहे हैं।
अटकलें यह भी है कि कुछ पार्टियां व्हिप जारी करने से परहेज कर सकती हैं जिससे उनके सांसदों के सदन में उपस्थित रहने और मतदान करने की अनिवार्यता नहीं रहेगी। ऐसी पार्टियों के सांसद मतदान के दौरान अनुपस्थित रह सकते हैं, जिससे दो-तिहाई बहुमत के लिए जरूरी सांसदों की संख्या कम हो जाएगी।
