अवधेश चौहान, जम्मू। कहते हैं इतिहास अपने आपको दोहराता है। यह कश्मीर का वही क्षेत्र और महीना है जब 71 साल पहले पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को हथियाने की साजिश रची थी, लेकिन उस समय परिस्थितियां अलग थीं। पाकिस्तानी सेना ने उत्तरी कश्मीर में वर्ष 1948 में अक्टूबर के तीसरे सप्ताह में ऐसी ही हिमाकत की थी।

पाक सेना ने हथियारों से लैस करीब दो हजार कबायलियों को महाराजा हरि सिंह की रियासत जम्मू कश्मीर पर हमला करने के लिए भेजा था। पाक सेना के सिपाही कबायलियों के वेश में यहां घुस आए थे, लेकिन महाराजा हरि सिंह के कमांडर ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने उड़ी सेक्टर में मोर्चा संभाल कर उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया था। रविवार को ऐसी ही एक बड़ी घुसपैठ की कोशिश को भारतीय सेना ने नाकाम बना दिया। पाकिस्तानी सेना आतंकियों को भारतीय क्षेत्र में धकेलने के लिए गत एक माह से गोलाबारी कर रही है।

 500 सिपाहियों के बलबूते रोका हमला 

महाराजा हरि सिंह की सेना में रहे पद्मश्री नरसिंह देव जम्वाल का कहना है कि 71 साल पहले दो हजार से अधिक घुसपैठिए हिंदुओं और सिखों का नरसंहार करते हुए श्रीनगर को कब्जे में लेना चाहते थे, लेकिन ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने अपनी सूझबूझ से मात्र पांच सौ सिपाहियों के बलबूते कबायलियों को कश्मीर घाटी में घुसपैठ करने से रोके रखा। उन्होंने उड़ी में नीलम वैली को कश्मीर घाटी से जोड़ने वाले पुल को उड़ा दिया ताकि कबायलियों के वाहन घाटी में न घुस पाएं।

ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह कुछ फौजी वाहनों को रात के समय लाइटें जलाकर घुमाते रहते थे ताकि कबायलियों को लगे कि महाराजा हरि सिंह की सेना का काफिला उड़ी पहुंच रहा है। ब्रिगेडियर घायल होने के बाद भी दुश्मनों तब तक लड़ते रहे, जब तक कि भारतीय सेना श्रीनगर एयरपोर्ट पर नहीं पहुंच गई। 26 अक्टूबर को ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह शहीद हो गए।

10 पाकिस्तानी सैनिकों और हिजबुल-जैश के 35 आतंकियों के मारे गए 

भारतीय सेना ने शनिवार रात को नियंत्रण रेखा पर उड़ी के टंगडार सेक्टर में  पाकिस्तान को बड़ा सबक सिखाया है। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए गुलाम कश्मीर की नीलम और लीपा घाटी में आतंकियों के चार लांचिंग पैड को पूरी तरफ तबाह कर दिया। इस कार्रवाई में करीब 10 पाकिस्तानी सैनिकों और हिजबुल और जैश के 35 आतंकियों के मारे जाने की सूचना है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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