देवेंद्रराज सुथार। भारत में प्रतिवर्ष पांच लाख लोग वक्त पर अंग न मिलने से मौत का शिकार हो जाते हैं। विडंबना है कि ज्यादातर उन लोगों को ही समय रहते अंग मिलते हैं, जो आर्थिक रूप से संपन्न होते हैं। इसी कारण मानव अंगों के अवैध कारोबार को बढ़ावा मिलता है।

उल्लेखनीय है कि देश में प्रतिवर्ष दस लाख व्यक्तियों में अंगदान करने वालों की संख्या 0.8 है। विकसित देशों जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, नीदरलैंड और जर्मनी में यह संख्या 10 से 30 के मध्य है। हमारे देश में इस संख्या के कम होने के निम्न कारण हैं-सही जानकारी का अभाव, धार्मिक मान्यता, सांस्कृतिक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह। कई देशों में अंगदान ऐच्छिक न होकर अनिवार्य है। हालांकि, भारत में ऐसा कर पाना संभव नहीं है, लेकिन जागरूकता पैदा कर इस संख्या को बढ़ाया जा सकता है।

जागरूकता पैदा करने में भी भारत पीछे

हमारा दुर्भाग्य है कि हम जागरूकता पैदा करने में भी पीछे हैं। भारत में अंगदान और अंग प्रत्यारोपण का मौजूदा परिदृश्य बहुत बुरे हाल में हैं। देश में करीब एक साल में दो लाख दस हजार लोगों को गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता होती है, लेकिन अभी मुश्किल से 3000-4000 प्रत्यारोपण ही हो पाते हैं। अमेरिका में यूनिवर्सिटी आफ मिशिगन के अध्ययन के अनुसार अमेरिका में कई लोग डरते हैं कि कहीं उनको दिया गया अंग किसी हत्यारे या चोर का न हो। वहां कुछ लोगों की यह मान्यता है कि इस तरह के दानकर्ता के अंग लगने कारण उनके व्यक्तित्व में भी बदलाव आ जाएगा। हमारे यहां भी कई झूठी मान्यताएं काम कर रही हैं।

मसलन लोगों में अंधविश्वास है कि यदि मृत व्यक्ति की आंखों को दान दिया जाता है तो उसे मरने के उपरांत स्वर्ग नहीं मिलता या अगले जन्म में वह उस अंग के बिना पैदा होगा। सच्चाई तो यह है कि अंगों को शरीर से निकालने से परंपरागत अंत्येष्टि क्रिया या दफन क्रियाओं में कोई बाधा नहीं आती। इससे शरीर के रंग-रूप में भी कोई परिवर्तन नहीं होता।

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन एवं महान संस्कृति है। दान, धर्म एवं उच्च संस्कार प्राचीन काल से ही हमारे समाज में वरिष्ठ स्थान रखते रहे हैं। महर्षि दधीचि ने दान की पराकाष्ठा का उदाहरण समाज के समक्ष रखा। वह भारतीय संस्कृति के प्रथम अंगदानी कहे जाते हैं। भारतीय संस्कृति में परहित सबसे बड़ा धर्म माना गया है। मृत्यु जीवन का सत्य है। हम जीवन और मृत्यु को प्राप्त होने के लिए जन्म लेते हैं। रबींद्रनाथ टैगोर के शब्दों में-मृत्यु जीवन से वैसे ही संबंधित है जैसे कि जन्म। जैसे चलने के लिए पांव उठाना होता है वैसे ही पांव नीचे भी रखना होता है। कोई भी आसानी से कल्पना कर सकता है कि मृत्यु ही जीवन का अंत है। अपने अंगों को मृतप्राय: रोगियों को बहुमूल्य उपहार के रूप में दान देकर अपनी मृत्यु को जीवन समान सार्थक बनाया जा सकता है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Edited By: Pooja Singh

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