नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। खाद्य सुरक्षा विधेयक पर अध्यादेश लाने के लिए केंद्र सरकार चाहे जितना शोर मचा रही हो, लेकिन उसकी राह आसान नहीं हो पा रही है। शायद यही वजह है कि विपक्ष के चौतरफा विरोध के बावजूद अध्यादेश लाने पर आमादा सरकार कैबिनेट में ही आमराय नहीं बना सकी। बैठक में राकांपा सुप्रीमो एवं कृषि मंत्री शरद पवार अध्यादेश की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुए और सरकार को अध्यादेश पर अपने कदम पीछे खींचने पड़े। अब सरकार का जोर विपक्ष एवं सरकार समर्थक दलों को मनाने के साथ ही संसद का विशेष सत्र बुलाकर उसमें चर्चा कराने पर है। इसका दायित्व तीन वरिष्ठ मंत्रियों को सौंपा गया है।

कैबिनेट की बैठक में खाद्य सुरक्षा विधेयक पर चर्चा तक नहीं हो सकी। विधेयक के लिए अध्यादेश जारी करने को लेकर जितना विरोध विपक्षी दलों का है, उससे कम सरकार के भीतर भी नहीं है। मंत्रिमंडल के सहयोगियों में भी इस पर आम राय नहीं है। खुद कांग्रेस के ही कुछ मंत्री अध्यादेश के पक्ष में नहीं हैं। ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कैबिनेट की बैठक के एक दिन पहले यह बयान देकर सभी को चौंका दिया कि 'वह अध्यादेश के पक्ष में नहीं हैं।' इससे कैबिनेट के अंदर के विरोधाभास का खुलासा हुआ।

सूत्रों के मुताबिक कैबिनेट की बैठक में खाद्य सुरक्षा विधेयक पर अध्यादेश का प्रस्ताव आते ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लोकतंत्र का हवाला देते हुए विपक्ष की चिंताओं का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि विधेयक के लिए अध्यादेश लाने की जगह सभी राजनीतिक दलों से चर्चा कर संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए।

संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए विपक्षी दलों के साथ राय-मशविरा करने का जिम्मा नेता सदन सुशील कुमार शिंदे, संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ और खाद्य राज्यमंत्री केवी थॉमस को सौंपा गया है। कैबिनेट की बैठक का ब्योरा देते हुए वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने कहा, 'खाद्य सुरक्षा बिल तैयार है।' खाद्य मंत्री थॉमस ने सहयोगियों में मतभेदों से इन्कार करते हुए कहा, 'भाजपा समेत सभी विपक्षी पार्टियां विधेयक के महत्व को देखते हुए इस पर विस्तृत चर्चा चाहती हैं। विधेयक को लेकर सभी दलों की सकारात्मक राय है।'

खाद्य सुरक्षा विधेयक संप्रग की महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका वादा उसने पिछले चुनाव घोषणा पत्र में किया था। सरकार के चार साल का कार्यकाल बीतने के बाद भी विधेयक कानून में तब्दील नहीं हो सका है। चुनाव में जाने से पहले कांग्रेस इसे पारित कराना चाहती है। इसी जल्दबाजी में वह अध्यादेश लाने की फिराक में थी, लेकिन विपक्ष के साथ सरकार में शामिल राकांपा और बाहर से समर्थन कर रही सपा की नाराजगी को देखते हुए अध्यादेश के विचार को त्याग दिया गया है।

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