डॉ अनिल जोशी। Van Mahotsav 2020 वन और वृक्ष की परिभाषा को एक बार फिर नए सिरे से समझने की आज आवश्यकता है क्योंकि वन किसी भी स्थान विशेष में प्रकृति की बहुत ही लंबी और गहरी प्रक्रिया से पैदा होते हैं। किसी भी भूमि में शुरुआती तौर पर सीधे वृक्ष पैदा नहीं हुए। छोटी प्रजातियों की एक के बाद एक शृंखलाओं ने जब मिट्टी का स्वरूप बदला तो कुछ ऐसे वृक्षों को जन्म दिया जो प्रकृति से जितना लेते थे, उतना देते थे। मसलन इससे पहले की जो भी छोटी प्रजातियां होती हैं वे भूमि को ज्यादा देती थीं और लेती कम थीं। जब भूमि पर मिट्टी पर ज्यादा जैविक पदार्थ मिलता चला गया, दूसरी बेहतर श्रेणी के पौधों का जन्म हुआ और इसी श्रेणी के पौधे फिर मिट्टी में जैविकता को जोड़कर और भी बेहतर पौधे को जन्म देती रहीं। इसी शृंखला में ऐसी स्थिति पैदा होती है जिसे हम वृक्ष और वनों की संज्ञा देते हैं।

हम किसी भी स्थान पर किसी भी वृक्ष को बिना सोचे समझे लगा देने से हमारी उस मंशा की आपूर्ति नहीं होती है जिसके लिए हम पौधारोपण करते हैं। कभी भी हम पौधरोपण के प्रति गंभीर नहीं हुए। हमने मात्र एक औपचारिकता के तहत पौधे लगाकर भूल गए कि उसकी रक्षा सुरक्षा के भी सवाल होते हैं। यही कारण है कि अगर हमने 50 वर्षों में रोपे गए पौधों के वृक्ष बनने की दर शायद 5-10 फीसद रही हो। एक बात हमें साफ समझ लेनी चाहिए कि किसी भी वृक्ष का योगदान तभी बेहतर संभव हो सकता है कि जब उसकी प्रकृति और मिट्टी की प्रकृति और जलवायु जिस पर उसे रोपित किया जा रहा है, वो समान हो।

हमारा देश तमाम तरह की प्रजातियों के अलग तरह के पारिस्थितिकी जाल में खुद को फंसा पाता है। उदाहरण के लिए केरल में पाई जाने वाली सबसे प्रचलित प्रजाति है जिसको सागौन कहा जाता है वो वहां की परिस्थितियों मिट्टी, आर्द्रता के साथ मैच करती है। अगर इस प्रजाति को पहाड़ों पर लगाने की चेष्टा की जाएगी तो तो वह पनप तो जाएगी लेकिन प्रकृति के स्वभाव को बदलेगी, वह मिट्टी के स्वभाव को बदल देगी। भूमि के नीचे मौजूद जलस्तर पर भी सीधा प्रभाव पड़ता है। कई बार सरकार और समाज के स्तर पर बेमेल जलवायु वाली प्रजातियों रोपण कर दिया जाता है, लेकिन यह प्रकृति के हित में नहीं होता। हमने अपने देश की पारिस्थितिकी पर आधारित इस संपदा वनीकरण को इन मापदंडों के तहत अपनाने की कोािशश नहीं की। तभी वनों का यह योगदान हमसे दूर होता जा रहा है।

यह भी जान लेना चाहिए कि वृक्ष और वनों को मात्र एक पेड़ के रूप में ही या एक पादप प्रजाति के रूप में ही नहीं समझना चाहिए। वृक्ष और वनों का मतलब मिट्टी से भी होता है, प्राणवायु से होता है, पानी से होता है और उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के केंद्र का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। ऐसे में किसी भी वनीकरण के समय चाहे वह बड़े स्तर का हो या व्यक्तिगत स्तर पर, हमें प्रकृति के मूल सिद्धांत का पालन करना चाहिए। इसे नकारने का सीधा मतलब मात्र वृक्षों का नहीं खोना बल्कि वृक्षों के इन तमाम लाभों को भी खोना है। आज प्रकृति को समझकर और उसी अनुरूप व्यवहार करने की दरकार है। क्योंकि प्रकृति पर नियंत्रण संभव नहीं है। अगर हम प्रकृति के बताए रास्ते पर नहीं चलते तो यह किसी न किसी रूप और रास्ते से दंड के साथ आगे की दिशा भी सिखा देती है।[संस्थापक, हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गनाइजेशन, देहरादून]

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