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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Nov 05, 2022 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

OTS Scheme के तहत उधारकर्ता अधिकार के रूप में समय के विस्तार का दावा नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

By AgencyEdited By: Achyut Kumar
Published: Sat, 05 Nov 2022 01:39 PM (IST)

सुप्रीम कोर्ट ने ओटीएस योजना के तहत उधारकर्ता अधिकार के रूप में समय के विस्तार का दावा नहीं कर सकता। ...और पढ़ें

ओटीएस योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला (फाइल फोटो)
ओटीएस योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला (फाइल फोटो)

नई दिल्ली, पीटीआई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक बारगी निपटान (ओटीएस) योजना के तहत भुगतान करने के अधिकार के मामले में एक उधारकर्ता समय के और विस्तार का दावा नहीं कर सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि कर्जदार को विस्तार का दावा करने के अधिकार के रूप में अपने पक्ष में कोई अधिकार स्थापित करना होगा।

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद

न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी की पीठ ने मार्च में दिए गए पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को रद कर दिया, जिसमें ओटीएस के स्वीकृत पत्र के अनुसार भारतीय स्टेट बैंक को ब्याज सहित शेष राशि का भुगतान करने के लिए एक उधारकर्ता, एक कंपनी को और छह सप्ताह का समय दिया गया था।

शीर्ष अदालत ने पाया कि ओटीएस योजना के तहत भुगतान को पुनर्निर्धारित करना और समय का विस्तार देना 'अनुबंध को फिर से लिखना' के समान होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते समय उचित नहीं है।  अदालत ने कहा कि भारतीय अनुबंध अधिनियम (Indian Contract Act) की धारा 62 के तहत आपसी सहमति से ही अनुबंध में संशोधन किया जा सकता है। संविधान का अनुच्छेद 226 कुछ रिट जारी करने के लिए उच्च न्यायालयों की शक्ति से संबंधित है।

पीठ ने कहा, 'अधिकार के रूप में उधारकर्ता यह दावा नहीं कर सकता कि उसने स्वीकृत ओटीएस योजना के अनुसार भुगतान नहीं किया है, फिर भी उसे अधिकार के रूप में और विस्तार दिया गया है। किसी भी नकारात्मक भेदभाव का दावा नहीं किया जा सकता है।'

एसबीआई की याचिका पर शीर्ष अदालत ने सुनाया फैसला

हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ एसबीआई द्वारा दायर एक अपील पर शीर्ष अदालत ने अपना फैसला सुनाया। यह नोट किया गया कि बैंक ने उधारकर्ता के पक्ष में नकद ऋण स्वीकृत किया था। बाद में, बैंक सितंबर 2017 में ओटीएस योजना लेकर आया, जो विशेष रूप से मंजूरी की तारीख से छह महीने के भीतर योजना के तहत भुगतान करने के लिए प्रदान करता है।

बैंक ने उधारकर्ता को भेजा ओटीएस प्रस्ताव

शीर्ष अदालत ने कहा कि बैंक ने उधारकर्ता को ओटीएस प्रस्ताव भेजा, जिसने इसे स्वीकार कर लिया। स्वीकृत ओटीएस के तहत, उधारकर्ता को 21 दिसंबर, 2017 तक राशि का 25 प्रतिशत जमा करना आवश्यक था, और शेष राशि ब्याज के साथ पत्र की तारीख से छह महीने के भीतर जमा की जानी थी।

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बैंक ने कर्जदार के अनुरोध को किया अस्वीकार

  • कर्जदार ने 2.52 करोड़ रुपये की शेष राशि के पुनर्भुगतान के लिए आठ से नौ महीने के विस्तार का अनुरोध किया, जिसे बैंक ने अस्वीकार कर दिया और 21 मई, 2018 तक भुगतान करने का निर्देश दिया। 
  • इसके बाद कर्जदार ने 21 मई, 2018 के बाद बकाया राशि का भुगतान करने के लिए आठ से नौ महीने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
  • अपने फैसले में, शीर्ष अदालत ने कहा कि बैंक ने अन्य ओटीएस योजनाएं शुरू की थीं और उधारकर्ता को खाते का निपटान करने की पेशकश की थी, लेकिन कंपनी ने उनका विकल्प नहीं चुना।  
  • शीर्ष अदालत के विचार के लिए यह सवाल उठता है कि क्या मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए स्वीकृत ओटीएस योजना के तहत शेष राशि का भुगतान करने के लिए उच्च न्यायालय को उचित ठहराया गया था।
  • पीठ ने 21 नवंबर, 2017 को स्वीकृत पत्र में कहा कि यह विशेष रूप से प्रदान किया गया था कि पूरा भुगतान 21 मई, 2018 तक किया जाना था। 
  • यह एक स्वीकृत स्थिति है कि उधारकर्ता ने स्वीकृत पत्र में उल्लिखित तिथि पर या उससे पहले स्वीकृत ओटीएस योजना के तहत देय और देय भुगतान नहीं किया।

अपील की अनुमति देते हुए, खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा अनुच्छेद 226 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए ओटीएस योजना के तहत शेष भुगतान करने के लिए उधारकर्ता को और समय देने का निर्णय 'अस्थिर और अलग रखने के योग्य है। इसलिए इसे रद किया जाता है।'

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