'एक व्यक्ति, एक वोट' पर सवाल, बढ़ती असमानता के बीच परिसीमन की जरूरत तेज
लोकतंत्र में 'एक व्यक्ति, एक वोट' के सिद्धांत को मजबूत करने के लिए परिसीमन आवश्यक है। निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं ...और पढ़ें
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बढ़ती असमानता के बीच परिसीमन की जरूरत तेज (फाइल फोटो)
HighLights
निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता।
'एक व्यक्ति, एक वोट' सिद्धांत असमानता से कमजोर हो रहा है।
गृह मंत्री अमित शाह ने परिसीमन की आवश्यकता पर बल दिया।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। लोकतंत्र की सबसे बुनियादी भावना है-समान प्रतिनिधित्व। ''एक व्यक्ति, एक वोट'' की संवैधानिक अवधारणा इसी विचार को साकार करती है कि हर नागरिक का मत समान मूल्य रखता है। लेकिन, जब निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या में असमानता बढ़ जाती है, तब यह सिद्धांत कमजोर पड़ने लगता है।
ऐसे में परिसीमन की प्रक्रिया अत्यंत आवश्यक हो जाती है। यदि किसी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक है और दूसरे में बहुत कम, तो कम जनसंख्या वाले क्षेत्र का मत अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी हो जाता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है।
पिछले दिनों लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह ने प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को युक्तिसंगत बनाने पर जोर देते हुए कहा था कि अधिक मतदाताओं वाली सीटों के सांसद मतदाता की आकांक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते।
मतदाताओं की संख्या में असमानता
उन्होंने विपक्ष से महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन करने का आग्रह करते हुए कहा कि परिसीमन प्रक्रिया प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को युक्तिसंगत बनाने के लिए आवश्यक है, क्योंकि ''एक व्यक्ति, एक वोट'' का विचार तभी सही अर्थों में लागू होगा।
मौजूदा समय में विभिन्न संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में भारी असमानता है। एक तरफ तेलंगाना की मलकाजगिरि सीट है, जहां 37.80 लाख से अधिक मतदाता हैं। गाजियाबाद में करीब 30 लाख वोटर सांसद चुनते हैं। वहीं दूसरी तरफ लक्षद्वीप में सिर्फ 58 हजार मतदाता हैं। ऐसे में परिसीमन एक व्यावहारिक जरूरत है।
परिसीमन का अर्थ है लोकसभा सीट की सीमा का पुनर्निर्धारण। एक बार लोकसभा सीट का पुनर्निर्धारण हो जाने पर, विधानसभा सीटों का आकार और माप भी बदल जाता है। एक लोकसभा सीट के अंतर्गत कम-से-कम पांच विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण लागू करने के लिए भी परिसीमन आवश्यक है। लोकसभा सीटों की सीमा 1976 में 550 निर्धारित की गई थी। 1971 में भारत की जनसंख्या 54 करोड़ थी। आज यह 140 करोड़ है। इसलिए, लोकसभा में सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना जरूरी है। इससे संसद में लोगों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होगा।
देश के सबसे बड़े संसदीय क्षेत्रसीट का नाम---------------मतदाता
मलकाजगिरि (तेलंगाना) 37.80 लाख
बेंगलुरु उत्तर (कर्नाटक) 32.15 लाख
गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) 29.48 लाख
गौतम बुद्ध नगर (उत्तर प्रदेश) 26.81 लाख
पश्चिमी दिल्ली 25.92 लाख
देश के सबसे छोटे संसदीय क्षेत्रसीट का नाम---------------मतदाता
लक्षद्वीप 58 हजार
दमन और दीव 1.34 लाख
लद्दाख 1.90 लाख
दादरा और नगर हवेली 2.83 लाख
अंडमान और निकोबार 3.15 लाख
यह स्थिति 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों के अनुसार है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के बाद इन आंकड़ों में बदलाव संभव है।
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