नवीन नवाज, श्रीनगर। 'अब सबकुछ बदल गया है, मैं भी और यहां का माहौल भी। 'एक पथरीली पहाड़ी पर बैठे अली काचो ने लंबी सांस भरते हुए कहा, 'आप नीचे सीधे सपाट मैदान में पोलो खेल रहे खिलाडिय़ों को देख रहे हैं, यदि 20 साल पहले आए होते तो यहां न पोलो खेली जा रही होती और न दर्शक होते। अगर कुछ होता तो चंद फौजी गाड़ियां, नियंत्रण रेखा के पार से पाकिस्तान द्वारा दागे गए गोलों की गूंज या फिर गोलों के शिकार नागरिकों के जलते मांस की गंध और लोगों का विलाप। पर अब ऐसा नहीं। यहां जिंदगी चहचहा रही है। अब यह विश्वनाथन स्टेडियम द्रास बन चुका है।'

जीवन के 55 बसंत पार कर चुके अली काचो ने अपनी कृत्रिम टांग की तरफ इशारा करते हुए कहा, मैं भी पोलो खेलता था, लेकिन सेना के साथ बतौर कुली काम करने के दौरान कारगिल युद्ध से करीब एक साल पहले यहां गिरे एक पाकिस्तानी गोले ने मेरी टांग छीन ली। उसने मैदान के बायीं तरफ नजर आ रही पहाडिय़ों की तरफ इशारा करते हुए बताया, वह तोलोलिंग और टाइगर हिल्स हैं। दोनों ही यहां से चार से आठ किलोमीटर दूर हैं। टाइगर हिल के सामने वाली चोटी पर कारगिल युद्ध से पहले पाकिस्तानी होते थे और वह जब चाहे वहां से इस तरफ गोला दागते थे। यह मैदान उनके निशाने पर रहता था, क्योंकि इस मैदान में अक्सर सैन्य वाहन खड़े होते थे। हाईवे भी उनकी सीधी रेंज में रहता था, सिर्फ टाइगर और तोलोलिंग की पहाड़ी पर बैठे हमारे जवानों के जवाबी प्रहार पर ही वह शांत रहते थे। कारगिल युद्ध के बाद से अब उस चोटी पर पाकिस्तानी नहीं हैं।

देश विदेश की पोलो टीमें यहां आकर खेल चुकीं
काचो ने कहा कि इस स्टेडियम में मंगोलिया के खिलाड़ी भी पोलो खेलने आ चुके हैं। पूरे देश में शायद ही कोई ऐसी बड़ी पोलो टीम होगी, जिसने बीते 15-20 सालों में यहां आकर पोलो न खेला हो। अब यहां लड़के ही नहीं लड़कियां भी पोलो सीख रही हैं। विश्वनाथन स्टेडियम द्रास और पोलो अब एक दूसरे का पर्याय बनते जा रहे हैं। यहां आने वाले पर्यटक युद्ध स्मारक और टाइगर हिल पर जाने के अलावा इस मैदान में पोलो का खेल देखने से खुद को रोक नहीं पाते हैं।

पाकिस्तानी गोलों के खौफ से मिल चुकी है मुक्ति
कासो ने कहा कि पिछले बीस सालों से हमने यहां कोई धमाका नहीं सुना है। यह ग्रेनेडियर्स के लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन की देन है। वह कारगिल युद्ध में तोलोलिंग पर कब्जे की मुहिम मेंं शहीद हुए थे, लेकिन उनकी शहादत ने पूरे द्रास को पाकिस्तानी गोलों के खौफ से मुक्ति दे दी है।

गोलों की जगह गूंज रही हौंसला बढ़ाते दर्शकों की आवाज
पेशे से स्कूल अध्यापक शब्बीर अहमद काचो ने कहा कि हम 1947 से यहां पाकिस्तानी गोलों की मार झेल रहे थे। गोलों के डर से यहां कोई बाहर नहीं निकलता था, लेकिन अब यहां सिर्फ घोड़ों की टॉप और पोलो खेल रहे खिलाडिय़ों व दर्शकों की आवाज ही गूंजती है।

विश्वनाथन व उनके साथियों की शहादत की देन है पोलो ग्राउंड
लद्दाख में परिवार सहित छुट्टियां बिताने आए कर्नल रङ्क्षवद्र ने कहा कि मैं कारगिल युद्ध के दौरान कैप्टन था। उस समय हम इसे एक सामान्य ग्राउंड ही कहते थे, यहां कुछ फौजी गाडिय़ां होती थीं, लेकिन आज यहां जो आप माहौल देख रहे हैं, वह लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन व उनके साथियों की शहादत की देन है।

कौन थे शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन
कोच्ची, केरल में जन्मे लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन सेना की 18 ग्रेनेडियर्स से संबंधित थे। वह अपनी यूनिट के साथ 19 मई 1999 को द्रास में 121 इंफेंट्री ब्रिगेड की कमान तले ऑपरेशन विजय में शामिल हुए। 18 ग्रेनेडियर्स के उस समय कमानाधिकारी कर्नल खुशहाल ठाकुर थे। उन्हें तोलोलिंग पर कब्जा किए पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ उस पर तिरंगा फहराने का जिम्मा मिला। इस अभियान के दौरान उनके अधीनस्थ मेजर राजेश अधिकारी तोलोलिंग को फतेह करने के अभियान में शहीद हो गए थे। ऊपर पहाड़ी पर पाकिस्तानी सैनिकों की एक पूरी कंपनी मौजूद थी। विश्वनाथन ने गोलियों की बौछार के बीच ही मेजर राजेश व अन्य तीन शहीद सैन्यकर्मियों के पार्थिव शरीर वापस लाए। इसके बाद उन्होंने दुश्मन पर फिर हमला बोला और पाकिस्तानी सेना की मशीनगन को खामोश करने के अलावा तीन पाकिस्तानी सैनिकों को हैंड टू हैंड कंबैट में मौत के घाट उतार दिया। उन्होंने तीन बंकरों पर भी कब्जा किया और इस दौरान गोली लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए। उन्हें अस्पताल पहुंचाया जाता, लेकिन उससे पहले ही युद्धभूमि में वह शहीद हो गए। उन्हें उनकी वीरता के लिए मरणोपरांत वीरचक्र से सम्मानित किया गया। उन्होंने चोटी 4590 व तोलोङ्क्षलग पर जीत दर्ज करने में अहम भूमिका निभाई।

दो महत्वपूर्ण चोटियां पर कब्जे से बदल गया था युद्ध का नक्शा
लेफ्टिनेंट कर्नल विश्वनाथन के कमानाधिकारी रहे खुशहाल ठाकुर के मुताबिक, विश्वनाथन ने जिस बहादुरी का परिचय दिया, उससे न सिर्फ हम तुलांग जीते बल्कि टाइगर हिल पर जीत दर्ज करने का रास्ता भी तैयार हुआ। इन दो महत्वपूर्ण चोटियां पर कब्जे के बाद तो पूरे युद्ध का नक्शा बदल गया और लेह-श्रीनगर हाईवे और द्रास कस्बे पर हमेशा मंडराने वाला पाकिस्तानी गोलाबारी का खतरा भी समाप्त हो गया।

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Posted By: Sanjay Pokhriyal