डॉ दिलीप कुमार। हमें दक्षिण अफ्रीका के विज्ञानियों और स्वास्थ्य संगठनों को धन्यवाद देना चाहिए, जिन्होंने समय रहते ओमिक्रोन वैरिएंट की पहचान की और दुनिया को आगाह किया। दक्षिण अफ्रीका से आए शुरुआती आकंड़ों से जो कुछ निष्कर्ष सामने आते हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह वैरिएंट डेल्टा की तुलना में ज्यादा संक्रामक है और डेल्टा की ही तरह ब्रेकथ्रू इन्फेक्शन्स यानी टीका लगने के बाद भी संक्रमित करने की क्षमता रखता है। इसी हफ्ते प्रकाशित एक प्रीप्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक डेल्टा वैरिएंट में रीइन्फेक्शन की दर नौ प्रतिशत थी, जबकि ओमिक्रोन में यह दर 25 प्रतिशत है। मौजूदा टीकों पर इसके प्रभाव और संRमण से जुड़े गंभीर लक्षणों पर अध्ययन अभी शुरुआती दौर में है।

इस सबके बीच एक अच्छा संकेत यह है कि इस वैरिएंट से दक्षिण अफ्रीका में संक्रमण दर में तो तेजी देखी गई, लेकिन जान गंवाने वालों की संख्या नियंत्रण में है। दक्षिण अफ्रीका के सिर्फ 29 प्रतिशत लोगों को टीका लगा है, जिनमें 25 प्रतिशत को दोनों डोज लग पाई है। कोरोना से लड़ने में मौजूदा टीके हमारा सबसे अहम हथियार हैं। भारत सरकार, स्वास्थ्य संगठनों और जनता ने वैक्सीनेशन की दिशा में बेहद सराहनीय काम किया है।

हम अपनी पूरी वयस्क आबादी को कम से कम एक डोज के टीकाकरण के लक्ष्य के काफी करीब पहुंच गए हैं। ऐसे में बिना किसी कोताही के हमें टीकाकरण की दर को और बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि जब तक हमारे यहां ओमिक्रोन वैरिएंट की लहर आए तब तक हमारी ज्यादा से ज्यादा आबादी पूर्ण रूप से वैक्सीनेटेड हो और हम बीमारी को भयावह होने से रोक सकें। टीकों के दम पर ही पूर्ण रूप से वैक्सीनेटेड देशों ने खतरनाक डेल्टा वैरिएंट के असर को एक हद तक नियंत्रण में रखते हुए लाखों जानें बचाईं।

हम यदि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा स्वीकृत मौजूदा टीकों की सूची देखें तो हमारे पास अभी तीन प्रकार के टीकों का विकल्प उपलब्ध है। इसमें फाइजर और माडर्ना के आरएनए आधारित टीके कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन के सीक्वेंस को लेकर तैयार किए गए हैं। ओमिक्रोन में जिस तरह से स्पाइक प्रोटीन में 32 म्युटेशन पाए गए हैं, उसे देखते हुए सबसे ज्यादा असर आरएनए आधारित इन्हीं टीकों पर होने का अनुमान है। लेकिन इसमें अच्छी बात यह भी है कि म्युटेशंस के आधार पर परिवर्तित करके इनका बूस्टर डोज बनाना भी आसान है। फाइजर ने जरूरत पड़ने पर 100 दिन के अंदर ही ओमिक्रोन के लिए नई वैक्सीन बनाने का दावा भी किया है।

फाइजर के सीईओ डा अल्बर्ट बोर्ला ने तो कोविड के भविष्य के वैरिएंट्स के लिए हर साल नई वैक्सीन बनाने की बात भी कही है। टीकों का दूसरा प्रकार है आक्सफोर्ड/एस्ट्राजेनेका और सीरम इंस्टीट्यूट का एडेनो वायरस आधारित टीका। इन्हें अभी तक के वैरिएंट पर प्रभावी पाया गया है। इनके विज्ञानी भी ओमिक्रोन के प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं और जरूरत पड़ने पर नई वैक्सीन बनाने की बात कह चुके हैं। तीसरे प्रकार में सिनोफार्म और भारत बायोटेक की कोवैक्सीन है, जिन्हें इनएक्टिवेटेड कोरोना वायरस के आधार पर बनाया गया है। इस वैक्सीन में पूरा वायरस पार्टिकल होता है, इसीलिए नए वैरिएंट से इनकी इफिकेसी पर प्रभाव पड़ने की आशंका कम है। जरूरत पड़ने पर इनकी भी नई डोज आसानी से बनाई जा सकती है। विश्व का विज्ञानी समुदाय आज इस स्थिति में है कि वह किसी भी वैरिएंट के खिलाफ आसानी से नए टीके बना सकता है। फाइजर और मर्क की एंटी कोविड टेबलेट भी जल्दी ही कोरोना महामारी से लड़ने में एक अहम हथियार साबित होगी।

एक और अहम बात, वैरिएंट चाहे कोई भी आए, वह रहेगा कोरोना की ही प्रजाति का, ऐसे में शारीरिक दूरी का पालन और मास्क लगाने का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। इसी सप्ताह विज्ञान की प्रतिष्ठित पत्रिका साइंस में प्रकाशित बांग्लादेश में किए गए रिसर्च से यह बात फिर स्पष्ट हो गई है कि जहां मास्क वितरित किए गए और मास्क के नियमों का पालन किया गया, उन इलाकों में लक्षण वाले कोरोना संRमण की दर में अपेक्षाकृत कमी पाई गई। सबसे महत्वपूर्ण बात जो दुनिया के समृद्ध राष्ट्रों को समझनी होगी कि इस महामारी से पूर्ण रूप से निपटने के लिए उन्हें वैक्सीन साङोदारी पर विशेष ध्यान देना होगा। जब तक हम दुनिया के सभी देशों को पूर्ण रूप से वैक्सीनेट करने का लक्ष्य नहीं प्राप्त करेंगे, नए वैरिएंट आने का खतरा हमेशा बना रहेगा और ऐसे में वैक्सीन को कम प्रभावी बनाने वाले वैरिएंट के आने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता। वसुधैव कुटुंबकम् की भावना के साथ सक्षम राष्ट्रों को आगे आकर वैक्सीन इक्विटी की दिशा में गंभीरता से विचार करना चाहिए।

[वायरोलॉजिस्ट, बेलर कालेज ऑफ मेडिसिन, ह्यूस्टन, अमेरिका]

Edited By: Sanjay Pokhriyal