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'संसद सिर्फ कानून नहीं बनाती, शांति और भरोसे का पुल भी हैं', ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन में बोले ओम बिरला

Published: Mon, 26 Oct 2026 09:18 PM (IST)

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ब्रिक्स संसदीय सम्मेलन में वैश्विक चुनौतियों के शांतिपूर्ण समाधान और सहयोग को मजबूत करने का आह्वान किया।

संसद सिर्फ कानून नहीं बनाती, शांति और भरोसे का पुल भी हैं। (X- @ombirlakota)

संसद सिर्फ कानून नहीं बनाती, शांति और भरोसे का पुल भी हैं। (X- @ombirlakota)

HighLights

  1. ब्रिक्स संसदों से संवाद, कूटनीति और सहयोग मजबूत करने का आह्वान किया।

  2. वैश्विक चुनौतियों के शांतिपूर्ण समाधान में संसदों की अहम भूमिका बताई।

  3. संसदें केवल कानून नहीं, जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी हैं।

जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने ब्रिक्स के सदस्य एवं साझेदार देशों की संसदों से संवाद, कूटनीति और सहयोग को मजबूत करने के साथ साझा प्रतिबद्धताओं को ठोस परिणामों में बदलने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संघर्ष, युद्ध, आतंकवाद एवं आर्थिक अस्थिरता एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। खामियाजा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ता है। ऐसे में वैश्विक चुनौतियों का शांतिपूर्ण समाधान निकालने, देशों के बीच भरोसा बढ़ाकर तनाव कम करने में संसदें बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

बिरला सोमवार को नई दिल्ली स्थित संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में आयोजित ब्रिक्स देशों के दो दिवसीय संसदीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। भारत 2025 में ब्रासीलिया में आयोजित 11वें ब्रिक्स संसदीय मंच के दौरान इसकी अध्यक्षता संभाल चुका है। नई दिल्ली में हो रहे 12वें मंच में सदस्य देशों के साथ साझेदार देशों के प्रतिनिधि भी भाग ले रहे हैं।

बिरला ने कहा कि दुनिया इस समय गहरी अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। क्षेत्रीय संघर्षों और युद्धों के साथ व्यापारिक तनाव, आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां सामने हैं, जिनका प्रभाव राष्ट्रीय सीमाओं से परे जाता है। इसलिए इनके समाधान के लिए सामूहिक जिम्मेदारी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जरूरी है।

संसदें सिर्फ कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं- बिरला

बिरला के अनुसार, संसदें सिर्फ कानून बनाने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति भी हैं। वे विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को अनुभव साझा करने, समान हितों की पहचान करने और मतभेदों के बीच सहमति बनाने का अवसर देती हैं। संसदीय कूटनीति के माध्यम से आपसी समझ बढ़ाई जा सकती है और अंतरराष्ट्रीय तनाव कम करने के लिए शांतिपूर्ण रास्ते तलाशे जा सकते हैं।

उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों की भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषाई एवं सामाजिक स्थितियां अलग हैं, लेकिन शांति, सुरक्षा, आपसी सम्मान और नागरिकों के बेहतर जीवन की आकांक्षा उन्हें जोड़ती है। संसदीय मंच को इन साझा उद्देश्यों को आगे बढ़ाने वाला प्रभावी माध्यम बनना चाहिए।

साझा प्रतिबद्धताओं को अब जमीन पर उतारने की जरूरत- बिरला

बिरला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में भारत में आयोजित ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि साझा प्रतिबद्धताओं को अब जमीन पर उतारने की जरूरत है। इसमें संसदों की भूमिका कानून निर्माण, बजट संबंधी निर्णयों, चर्चा और सरकारी कामकाज की निगरानी के जरिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

ब्रिक्स की सफलता इससे तय होगी कि सदस्य देश अपनी साझा आकांक्षाओं को कितने प्रभावी ढंग से ठोस कार्रवाई में बदलते हैं। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने भी ब्रिक्स को वैश्विक और क्षेत्रीय सहयोग का मंच बताया और वैश्विक साझेदारी के साथ परस्पर नवाचार, सहयोग और सतत विकास पर जोर दिया।

जेन-जी की आवाज को संसदें सुनें- बिरला

ओम बिरला ने युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने में संसदों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि युवा केवल अपने भविष्य में निवेश नहीं, बल्कि देशों के सामूहिक भविष्य हैं। उनकी ऊर्जा, रचनात्मकता और क्षमताओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ने के लिए संसदों को उनकी चिंताओं एवं अपेक्षाओं को सुनना चाहिए।

बिरला के अनुसार युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और आगे बढ़ने के अवसर मिल रहे हैं, लेकिन उनकी प्रतिभा को निखारने के लिए सम्मानजनक और अनुकूल वातावरण भी जरूरी है। संसदों को बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप स्वयं को विकसित करना चाहिए।