यूपीएससी जैसा संवैधानिक दर्जा, परीक्षाओं में सुधार के लिए सुझाव... NTA में बड़े बदलाव की तैयारी
नीट पेपर लीक विवाद के बाद, नंदन नीलेकणि की अगुवाई वाली समिति एनटीए को यूपीएससी जैसा संवैधानिक दर्जा देने की ...और पढ़ें

एनटीए को यूपीएससी जैसा संवैधानिक दर्जा देने की तैयारी (AI फोटो)

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। नीट पेपर लीक विवाद के बाद एनटीए ( नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) के काम-काज पर जिस तरह से गंभीर सवाल खड़े हुए है, उसमें परीक्षाओं में सुधार को लेकर इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अगुवाई में गठित उच्च अधिकार प्राप्त समिति उसके स्वरूप में बदलाव की अहम सिफारिशें कर सकती है। जिसमें एनटीए को यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) जैसा संवैधानिक दर्जा देने की सिफारिश भी शामिल हो सकती है।
इस समिति ने 28 अक्टूबर तक अपनी रिपोर्ट देने के साथ कई अहम बदलाव के संकेत दिए हैं। समिति की ओर से इस दौरान परीक्षाओं में सुधार को लेकर लिए जा रहे सुझावों में भी बड़ी संख्या में सुझाव सिर्फ एनटीए को सशक्त बनाने और उसे संवैधानिक मजबूती देने को लेकर मिले है।
सूत्रों के मुताबिक समिति इस दौरान आम लोगों व विशेषज्ञों की ओर से पचास हजार से अधिक सुझाव मिले हैं। जो एनटीए को सशक्त करने, प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया में बदलाव व परीक्षा केंद्रों के चयन आदि से जुड़े है।
एनटीए को यूपीएससी की तरह बनाने के सुझाव वैसे तो 2024 में नीट पेपर लीक विवाद मामले के बाद आने लगे थे। सुप्रीम कोर्ट और संसदीय समिति ने भी इसे स्वायत्त व संवैधानिक दर्जा देने का सुझाव दिया था। अभी एनटीए शिक्षा मंत्रालय के अधीन एक संस्था के रूप में काम करती है।
परीक्षाओं में सुधार को लेकर गठित उच्च अधिकार प्राप्त समिति के प्रमुख नीलेकणि ने पिछले दिनों पेपर लीक को खत्म करने के लिए जिस तरह से प्रश्न पत्र को परीक्षा के दिन या उससे कुछ घंटे पहले तैयार करने पर किए जा रहे विचार को साझा किया था। इसमें प्रश्न पत्रों का एक बड़ा बैंक बनाने और एसआइ के जरिए प्रश्न पत्रों को अंतिम समय तैयार करने जैसे बिंदुओं को साझा किया था।
संवैधानिक दर्जा मिलने से क्या होगा लाभ
संवैधानिक दर्जा मिलने से एनटीए के पास अधिक शक्तियां मिल जाएंगी। उसे परीक्षा से जुड़े किसी भी सुधार के लिए मंत्रालय की ओर ताकना नहीं पड़ेगा। जैसे नीट यूजी की परीक्षा को कंप्यूटर के जरिए कराने के लिए शिक्षा मंत्रालय काफी समय से पैरवी कर रहा है लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय तैयार नहीं हो रहा है।
सरकार की उसके काम-काज में दखल कम होगी। अधिकारियों-कर्मचारियों की तैनाती के निर्णय खुद ले सकेगा। संसद के प्रति उनकी जवाबदेही सुनिश्चित होगी और काम-काज की रिपोर्ट हर साल संसद को देनी होगी।
