नई दिल्ली [मुकेश केजरीवाल]। इस बार नीम पर हमला अमेरिका या यूरोप से नहीं, अपने ही पड़ोस के देशों से हुआ है। जिस नीम को सेहत का खजाना माना गया है, आसियान के दस देशों ने उससे बने सामान की बिक्री पर ही प्रतिबंध लगा दिया है। आयुर्वेदिक दवा और उत्पाद बनाने वाली कंपनियां ही नहीं, वैज्ञानिक और विशेषज्ञ तक इससे हैरान हैं। इसके बावजूद केंद्र सरकार इस पाबंदी को हटवाने के लिए कोई पहल नहीं कर रही है।

आसियान देशों में पारंपरिक चिकित्सा पद्धति की औषधि और स्वास्थ्य उत्पाद आदि पर निगरानी रखने वाली समिति ने ऐसे सभी उत्पादों की खरीद-बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है, जिनमें नीम का कोई भी इस्तेमाल किया गया हो। सिंगापुर में हुई इसकी उत्पाद कार्यकारी समूह [पीडब्लूजी] की ताजा बैठक में यह फैसला किया गया है। 30 जून को हुए इस फैसले के आधार पर मलेशिया, इंडोनेशिया, सिंगापुर और थाइलैंड और फिलीपींस सहित सभी दस आसियान देशों की सरकारों ने ऐसे सभी उत्पादों का कारोबार करने वालों को नोटिस जारी कर दिया है।

अफ्रीकी देशों में नीम की खेती को बढ़ावा देने के बाद अब चीन में नीम कारोबार के साथ जुड़े डॉ. रमेश सी सक्सेना आसियान के इस कदम को पूरी तरह मूर्खतापूर्ण करार देते हैं। वे कहते हैं कि कैंसर और एचआइवी एड्स के इलाज में इसके इस्तेमाल के लगातार उत्साहव‌र्द्धक नतीजे सामने आ रहे हैं। संभव है कि जहरीला प्रभाव रखने वाले 'चाइना बेरी' या 'बकायन' के भ्रम में नीम पर प्रतिबंध लगा दिया गया हो, लेकिन भारत सरकार को तुरंत नीम और इसमें अंतर बताने के लिए दखल देना चाहिए।

दिल्ली के बापू नेचर क्योर हॉस्पिटल एवं योगाश्रम के निदेशक डॉ. आरएम नायर कहते हैं कि नीम के पत्ते का चर्म रोग से लेकर डायबिटीज जैसी बीमारियों के इलाज के लिए वे बेहद सफलतापूर्वक उपयोग कर रहे हैं। इससे बने उत्पादों का मनुष्य के स्वास्थ्य पर किसी तरह का खतरा नहीं हो सकता। उल्टे वैज्ञानिक अध्ययनों में साबित हो चुका है कि यह पशुओं और यहां तक कि पर्यावरण तक के लिए बेहद लाभकारी है।

आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों के संगठन 'आयुर्वेदिक औषधि उत्पादक संघ' के महासचिव प्रदीप मुल्तानी ने स्वास्थ्य और वाणिज्य मंत्रालय से प्रतिबंध खत्म करवाने की मांग की है।

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