पवन कुमार, नई दिल्ली। यह जरूरी नहीं है कि जिस हत्या को परिजनों द्वारा अंजाम दिया गया हो, वह ऑनर किलिंग ही हो। उनके द्वारा की गई हर हत्या को ऑनर किलिंग का नाम देना सही नहीं है। हत्या के मामले में यह देखा जाना जरूरी है कि उसके पीछे क्या कारण है और लोगों की उसमें क्या भूमिका क्या है? दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एस रविंद्र भट्ट व न्यायमूर्ति मुक्ता गुप्ता की खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए ऑनर किलिंग के आरोप में पांच अभियुक्तों की फांसी की सजा को रद करते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई है।

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खंडपीठ ने कहा कि निचली अदालत ने अभियुक्त मोहम्मद सलीम, शाहीन अब्बास, साजिद वसीम, शाहीन जरगम अली व शब्बीर कासिम को ऑनर किलिंग के मामले में अधिकतम सजा के रूप में फांसी की सजा सुनाई है। मगर, यह मामला ऑनर किलिंग का नहीं बनता है।

पेश तथ्यों के अनुसार, घर से भागकर प्रेम विवाह करने वाले युगल पर शादी के बाद कोई हमला नहीं हुआ, न ही उन्हें कोई धमकी मिली। जबकि वे उसी इलाके में रहते थे। शादी के डेढ़ साल बाद पति व जेठ पर हमला किया गया, जिसमें जेठ की मौत हो गई। इस घटना को ऑनर किलिंग नहीं कहा जा सकता।

यह था मामला:

पुलिस के अनुसार, बल्ली मारान क्षेत्र में साजिद की बहन रूबीना ने पड़ोसी मोहम्मद तैयब से 1 मई, 2007 को प्रेम विवाह कर लिया था। कासिम व तैयब अलग-अलग समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इस कारण दोनों परिवारों के बीच शत्रुता बढ़ गई। 7 जुलाई, 2008 को बदला लेने के लिए शाहीन जरगम व साजिद वसीम ने सलीम, अब्बास व कासिम के साथ मिलकर तैयब व उसके भाई मोहम्मद तारिक को बातचीत के लिए बुलाया।

वहां पर उन्होंने दोनों भाइयों पर फायरिंग कर दी, जिसमें तारिक की मौत हो गई थी और तैयब गंभीर रूप से घायल हो गया था। निचली अदालत ने मामले में पांचों अभियुक्तों को 3 सितंबर, 2011 को फांसी की सजा सुनाई थी।

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