'बत्तियां बुझा दीं, बूथ कब्जाए और ज्योति बसु को बाहर फेंका'; निशिकांत दुबे ने माकपा दस्तावेज साझा कर कांग्रेस पर साधा निशाना
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ईवीएम की आलोचना को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने माकपा के ...और पढ़ें

निशिकांत दुबे ने कांग्रेस के ईवीएम विरोध पर साधा निशाना

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डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे ने इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) की लगातार आलोचना को लेकर कांग्रेस और विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने माकपा के 1972 के ऐतिहासिक दस्तावेज साझा किए। इनमें आरोप लगाया गया था कि बंगाल में कागजी मतपत्र प्रणाली के तहत कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर धांधली और बूथों पर कब्जा कराया था।
भाजपा सांसद ने विपक्ष पर मतपत्रों से मतदान की वापसी की वकालत करने में पाखंड का आरोप लगाते हुए वामपंथी पुस्तिका का हवाला दिया।
दुबे ने एक्स पर लिखा, “माकपा का मार्च 1972 का प्रस्ताव देखिए, जिसमें मतपत्रों से चुनाव कराने की मांग की गई थी। कांग्रेस ने बूथों पर कब्जा किया, बत्तियां बुझा दीं, रात में नतीजे घोषित किए, कामरेड ज्योति बसु को पीटा और उन्हें मतगणना कक्ष से बाहर फेंक दिया और चुनाव हार गई।”
चुनावों की निष्पक्षता को लेकर उनकी पार्टी के सवाल उठाने पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए गोड्डा के सांसद ने कहा, “राहुल गांधी जी, चुनाव आयोग को बंद कर देना चाहिए और चुनावों का बहिष्कार करना चाहिए—यह सब इसमें लिखा है। अब वे किस मुंह से विरोध कर रहे हैं? यह अज्ञानता की पराकाष्ठा और नफरत फैलाने की हद है।”
दुबे की ओर से साझा किए गए 1972 के माकपा दस्तावेज के अनुसार, बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस ने मतदान केंद्रों पर कब्जा करने, मतदाताओं को डराने और मतपेटियों में मतपत्र भरने के लिए गुंडों के साथ राज्य पुलिस को तैनात किया था।
दस्तावेज में वरिष्ठ मार्क्सवादी नेता ज्योति बसु की बारानगर सीट से 39 हजार से अधिक मतों से हुई विवादित हार का उल्लेख है। माकपा ने इस नतीजे को लोकतंत्र का “मजाक” बताया था, जबकि बसु को जमीनी स्तर पर मजबूत समर्थन हासिल था। इसके बाद चुनाव को रद घोषित करने की मांग उठी थी।
दुबे ने कहा कि विपक्ष ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है, जबकि उसके मौजूदा सहयोगियों के ऐतिहासिक दस्तावेज दिखाते हैं कि कागजी मतपत्रों से हुए चुनाव बूथों पर कब्जे, शारीरिक हिंसा और संस्थागत हेरफेर से प्रभावित थे।
(न्यूज एजेंसी एएनआई के इनपुट के साथ)
