'वैश्विक अनिश्तिता स्थाई, अब भविष्य की तैयारी पर जोर', वित्त मंत्री सीतारमण ने बताईं भारत की 4 मुख्य प्राथमिकताएं
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भू-राजनीतिक कारणों से बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता को स्थायी बताते हुए भारत की भावी आर्थिक नीतियों की रूपरेखा बताई।

वित्त मंत्री सीतारमण ने बताया भविष्य का आर्थिक रोडमैप (फाइल फोटो)

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भूराजनीतिक वजहों से जिस तरह से अमेरिका समेत कुछ और देश वैश्विक कारोबार की सामान्य गति को प्रभावित कर रहे हैं, उसे केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बढ़ते वैश्विक अनिश्चितता का एक बड़ा कारण बताया है। वैश्विक अनिश्चितता को अब एक स्थाई स्थिति बताते हुए सीतारमण ने भारत की भावी आर्थिक नीतियों की भी एक झलक दी है।
उन्होंने संकेत दिया है कि सरकार की आगामी नीतियों में नये युवा कामगारों के साथ ही पहले से कार्यरत कामगारों के कौशल विकास पर जोर होगा। साथ ही निजी क्षेत्र के साथ मिल कर शोध व अनुसंधान पर खर्च बढ़ाने की कोशिश।
इसके अलावा भारत आत्मनिर्भपर बनने की कोशिश करेगा लेकिन दुनिया के अलग अलग देशों के साथ अपनी रणनीतिक जरूरतों के साथ साझेदारी स्थापित करने से भी पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने पिछले एक दशक में भारतीय इकोनमी की जो सशक्त नींव रखी है, अब उसको मजबूत बनाते हुए वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने का काम करना है।
कौटिल्य इकोनोमिक कान्क्लेव को संबोधित करते हिए सीतातरमण ने कहा कि आने वाले वर्ष तैयारी की मांग करते हैं और भारत इस दौर में मजबूती के साथ प्रवेश कर रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा को सबसे प्रमुख वरीयता देते हुए उन्होंने इसके लिए रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति में स्वायत्तता हासिल करने की बात कही। यह सरकार की आर्थिक नीति के केंद्र में रहेगा। इसके लिए ही सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन, रेअर अर्थ कैरीडोर, सेमीकंडक्टर मिशन जैसे कार्यक्रमों की शुरुआत की है।
दूसरी प्राथमिकता, वैश्विक आर्थिक रिश्तों पर होगी। अमेरिका का नाम लिये बगैर उन्होंने कहा कि भू-राजनीतिक मतभेदों को व्यापार और निवेश की दीवार नहीं बनाया जाना चाहिए। कारोबारी वादों का पालन होना चाहिए, बाजार को खुला रखना चाहिए व जहां तक संभव हो सेवाओं, उत्पादों, ऊर्जा, पूंजी के प्रवाह को स्थिर रखना चाहिए।तीसरी प्राथमिकता कौशल विकास को लकेर होगी।
वित्त मंत्री ने कहा कि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकें काम की प्रक्रिया और जरूरी योग्यताएं बदल रही हैं।नए युवा कामगारों को तैयार करने के साथ ही पहले से कार्यरत लोगों को कौशल उन्नयन और नई भूमिकाओं में जाने का सहारा देना होगा। उद्योग को प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और कार्यस्थल पर सीखने में बड़ी भूमिका लेनी होगी। उद्देश्य यह है कि तकनीकी के उपयोग से बेहतर रोजगार के अवसर सृजित हो व उत्पादकता को बढ़ाया जाए।
चौथी प्राथमिकता में उन्होंने अनुसंधान में निजी निवेश की कमी को साफ रेखांकित किया। भारत का आरएंडडी व्यय सकल घरेलू उत्पाद का 0.83 फीसद है जबकि वैश्विक औसत 2.7 प्रतिशत है। कुल आरएंडडी खर्च में निजी क्षेत्र का हिस्सा केवल 36 फीसद है। निवेश का पैमाना और निजी भागीदारी दोनों बढ़ाना जरूरी है। भारत सरकार ने इसके लिए एक लाख करोड़ रुपये की रिसर्च, डेवलपमेंट एंड इनोवेशन योजना लांच की है।
