नवनीत शर्मा। निदा.....यानी आवाज़। रूह तक उतरने वाली ध्‍वनि। ध्‍वनि जिसे आसान रहते हुए भी संवेदनशील विषयों पर सार्थक कहना आता था। जो सूफियाना होते हुए दुनियादार थी और दुनियादार होते हुए भी सूफियाना थी। कहीं ज़मीं तो कहीं आस्‍मां की तलाशी लेने वाली आवाज़...सब कुछ भुला देने वाली आवाज़....और ऐसी आवाज़ जाे आईना बन जाती है। किसी मस्जिद में जाना किसी रोते हुए बच्‍चे को हंसाने से बड़ी बात नहीं है...यह ऐलान करने वाली आवाज़। मौला से विनती करने वाली आवाज़ कि गरज और बरस... धरती बहुत प्‍यासी है।

दरअसल निदा फाजली होना ऐसी आवाजों का मिश्रण होना है जिनमें दर्द की शिनाख्‍त है, खुशी की संभावनाएं हैं और जहां जरूरी हो वहां टकराने का साहस भी। ये तमाम खूबियां एक आशिक की होती हैं और निदा आशिक थे। सिर्फ यहां तक आशिक नहीं कि उनके साथ दिल्‍ली के एक कॉलेज में कोई मिस टंडन पढ़ती थी....उसे पसंद करने लगे थे... इससे पहले कि वह इज़हार कर पाते, मिस टंडन की मौत हो गई। व‍हां से मिले दर्द को उन्‍होंने इतना विस्‍तार दिया कि वह आशिक हुए इस जीवन के। इसके उलझाव और सुलझाव के। इसके तमाम पहलुओं के । फिल्‍म सरफरोश में जब सोनाली बेंद्रे को देखते हुए आमिर खान इस ग़ज़ल को नुमायां कर रहे होते हैं, उन शब्‍दों से निदा फाज़ली यकीनन झांकते हैं :

होश वालों को खबर क्‍या, बेखुदी क्‍या चीज है
इश्‍क कीजे फिर समझिए जिंदगी क्‍या चीज है

यह निदा ही कर सकते थे। फिक्र में भी बेफिक्री का आलम निदा साहब के पास ही था। इसके लिए बच्‍चा हो जाना पड़ता है। बच्‍चा यानी साफ...पवित्र, निश्छल। इसीलिए तो वह कह सके :

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलों यूं कर लें
किसी रोते हुए बच्‍चे को हंसाया जाए

इसी गजल का शे'र है :
अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाए
घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए

यह घर में बिखरी हुई चीजों को तरतीब देना एक ठीक दिशा का पता देना है। घर के कई अर्थ हैं। यह अर्थ देश भी हो सकता है। इसके बरक्‍स जॉन एलिया कहते हैं :

कौन इस घर की देखभाल करे
रोज एक चीज टूट जाती है

लेकिन जिंदगी, तरतीब या लय के आशिक ही चीजें ठीक करने का तसव्‍वुर कर सकते हैं। यही कारण है कि निदा के अंदर का बच्‍चा एक पवित्र और सकारात्‍मक बेखुदी में रहता है :

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहां होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला

यह नादानी कितनी पवित्र है। धूर्त और रणनीतिक अक्‍लमंदी से तो कही बेहतर। और बड़ी से बड़ी बात अक्‍सर बच्‍चे ही सहजता के साथ कह जाते हैं। निदा के भीतर के इस बालक को देखें, कैसे सवाल करता रहा:

बच्‍चा बोला देख कर मस्जिद आलीशान
अल्‍ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान ?
नक़्शा ले कर हाथ में बच्चा है हैरान
कैसे दीमक खा गई उस का हिन्दोस्तान

यह नादानी बहुत बार गहरे पानी पैठ कर मोती ले आती है :

कोई हिंदू, कोई मुस्लिम कोई ईसाई है
सबने इंसान न बनने की कसम खाई है

इस होश और अक्‍ल ने अमल यानी क्रिया का नुकसान किया है। अक्‍लमंदी बहुत बार व्‍यक्ति को निष्क्रिय बना देती है :

उसका कसूर ये था बहुत सोचता था वो
वो कामयाब हाेके भी नाकाम रह गया

क्‍या यह दुविधा शेक्‍सपीयर के त्रासद नायक हेमलेट की नहीं है? यकीनन है। टू बी ऑर नॉट टू बी, दैट्स द क्‍वेशचन।

निदा ने भाषा के प्रयोग से भी हाथ नहीं खींचे। जहां जिस भाषा से जो मिला ले लिया। और कहीं कहीं तोड़ फोड़ भी की। यह लोक की जड़ों में पगे मौलिक व्‍यक्ति का ही काम हो सकता है। अकारण, बिना कारण, बिला वजह की जगह एक प्रयोग देखें :

उसको भूले बरसों गुजरे लेकिन आज न जाने क्‍यों
आंगन में हंसते बच्‍चों को बे कारण धमकाया है

निदा की बेखुदी या नादानी में जो खुदी और अक्‍लमंदी का तत्‍व है वो उन्‍हें चौकस रखता है। ऐसा नहीं कि उनकी निगाह संवेदनशील विषयों पर नहीं पड़ी।

ये शे'र आज भारत जैसे मुल्‍क में भी कितने लोग लिख सकते हैं :

उठ उठ के मस्जिदों से नमाजी चले गए
दहशतगरों के हाथ में इस्‍लाम रह गया

निदा फाज़ली ने शरीर छोड़ा है, अपने पाठकों और चाहने वालों के दिल नहीं। इसलिए जब सितार के नोट्स के साथ भूपेंद्र अब भी गाते हैं कि कभी किसी को मुकम्‍मल जहां नहीं मिलता / कहीं जमीं तो कहीं आस्‍मां नहीं मिलता तो निदा हमारी मदद कर रहे होते हैं कि हम उस जगह से प्‍यार ढूंढ़ें जहां से उम्‍मीद थी पर मिला नहीं।

कई बार लगता है, अमीर खुसरो से लेकर मीर और गालिब तक सब अपनी ज़बां और लहजा निदा को दे गए थे। दोस्‍तों के दोस्‍त थे निदा।

जगजीत सिंह के साथ दोस्‍ती का आलम यह रहा कि निदा भी मशहूर हुए और जगजीत भी। दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है/मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है। यह दोस्‍ती आगे तक रही। दोनों के बीच देखिए क्‍या संयोग था। जगजीत सिंह 1941 में आठ फरवरी को पैदा हुए थे जबकि उसके 75 साल बाद निदा फाजली ने आठ फरवरी, 2016 को शरीर छोड़ा। इसी तरह निदा फाजली 12 अक्‍टूबर, 1938 को पैदा हुए तो जगजीत सिंह ने 10 अक्‍टूबर, 2011 को शरीर छोड़ा।

ग़ज़ल या नज्‍म ही नहीं, दोहों में भी निदा ने जो तस्‍वीर हर रंग की खींची है, वह अपनी मिसाल आप है। इस संसार के पहले दिन से ही सूरज निकल रहा है। सदियां बीत गईं लेकिन दिन चढ़ने के बाद उसे इस रूप में निदा के सिवा कौन देख सका :

नदिया सींचे खेत को तोता कुतरे आम
सूरज ठेकेदार सा सबको बांटे काम
सीधा-साधा डाकिया जादू करे महान
एक ही थैले में भरे आँसू और मुस्कान

निदा क्‍योंकि किसी खूंटे से नहीं बंधे, इसलिए उनकी लोकतांत्रिक और राजनीतिक समझ विस्मित करती है। कुछ अरसे के बाद सरकारें या चेहरे बदलना लोकतंत्र का नियम है लेकिन वह कैसे बदलता है, यह बड़ी बात है। जिनके पेट में कुछ नहीं है, वे विरोध ही करेंगे। निदा का यह रंग भी देखें :

हर एक घर में दिया भी जले अनाज भी हो
अगर न हो कहीं ऐसा तो एहतिजाज भी हो
हुकूमतों को बदलना तो कुछ मुहाल नहीं
हुकूमतें जो बदलता है वो समाज भी हो 

मुक्‍तदा हसन से निदा फाजली बने निदा पाकिस्‍तान बनने पर भी भारत में रहे। माता-पिता वहां चले गए। परिवार बंट गया। जिंदगी के एक मोड़ पर जब पता चला कि पिता इंतकाल फरमा गए हैं, तो ऐसी नज्‍़म निकली जो हर पिता पुत्र को पढ़नी चाहिए :

तुम्हारी कब्र पर मैं
फ़ातेहा पढ़ने नही आया,
मुझे मालूम था, तुम मर नही सकते
तुम्हारी मौत की सच्ची खबर
जिसने उड़ाई थी, वो झूठा था,
वो तुम कब थे?
कोई सूखा हुआ पत्ता, हवा मे गिर के टूटा था ।

मेरी आंखें
तुम्हारे मंज़रो मे कैद है अब तक
मैं जो भी देखता हूँ, सोचता हूँ
वो, वही है
जो तुम्हारी नेकनामी और बदनामी की दुनिया थी ।

कहीं कुछ भी नहीं बदला,
तुम्हारे हाथ मेरी उंगलियों में सांस लेते हैं,
मैं लिखने के लिये जब भी कागज कलम उठाता हूं,
तुम्हे बैठा हुआ मैं अपनी कुर्सी में पाता हूं |

बदन में मेरे जितना भी लहू है,
वो तुम्हारी लगजिशों नाकामियों के साथ बहता है,
मेरी आवाज में छुपकर तुम्हारा जेहन रहता है,
मेरी बीमारियों में तुम मेरी लाचारियों में तुम |

तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है,
वो झूठा है, वो झूठा है, वो झूठा है,
तुम्हारी कब्र में मैं दफन तुम मुझमें जिन्दा हो,
कभी फुरसत मिले तो फातेहा पढ़ने चले आना |

निदा फाजली साहब तब तक रहेंगे, जब तक मो‍हब्‍बत जिंदा रहेगी, जब तक इन्‍सानियत जिंदा रहेगी। उन्‍हें नमन।

Posted By: Sachin Bajpai