'फूड प्रोडक्ट्स पर वॉर्निंग लेबल प्रस्ताव के लिए 1 साल का समय क्यों?', NGO ने FSSAI के प्रस्ताव का किया विरोध
सुप्रीम कोर्ट के सख्त दखल के बाद खाद्य पदार्थों पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' लगाने की प्रक्रिया फिर चर्चा में आ गई है।

FSSAI के प्रस्ताव पर NGO की आपत्ती (सांकेतिक तस्वीर)
HighLights
सुप्रीम कोर्ट के दखल से खाद्य पदार्थों पर चेतावनी लेबल की प्रक्रिया चर्चा में।
NGO ने FSSAI के 365 दिन के स्वैच्छिक अवधि प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई।
यह विवाद उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य अधिकारों और खाद्य सुरक्षा पर केंद्रित है।
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के सख्त दखल के बाद खाद्य पदार्थों के पैकेटों पर 'फ्रंट-ऑफ-पैक वॉर्निंग लेबल' लगाने की प्रक्रिया एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। इस नियम को लागू करने में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की तरफ और वक्त मांगे जाने पर उस एनजीओ (NGO) ने कड़ी आपत्ति जताई है, जिसकी याचिका पर शीर्ष अदालत ने FSSAI को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया था।
'3S and Our Health Society' नामक इस एनजीओ ने FSSAI के इस कदम को सीधे तौर पर मामले को टालने और लटकाने वाला बताया है, जिससे एक बार फिर खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई है।
अब समझिए FSSAI के प्रस्ताव के बारे में
बता दें कि FSSAI ने इस नियम को पूरी तरह अनिवार्य बनाने से पहले 365 दिन का स्वैच्छिक पीरियड रखने का प्रस्ताव दिया है। इसके बाद 1 जुलाई से इसे सख्ती से लागू करने की बात कही गई है।
वहीं बात NGO की आपत्ति की करें तो, NGO का कहना है कि अगर नियम साल 2027 के शुरुआती महीनों में फाइनल भी हो जाते हैं, तो इस एक साल के स्वैच्छिक समय और जुलाई की डेडलाइन के चक्कर में आम उपभोक्ताओं को अनिवार्य चेतावनियों के लिए जुलाई 2028 तक लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।
अब समझिए NGO की मांग क्या है?
NGO ने FSSAI के एक साल के लंबे समय का विरोध करते हुए मांग की है कि कंपनियों को देने वाला ट्रांजैक्शन पीरियड 1 साल के बजाय महज 1 महीने का होना चाहिए, ताकि ग्राहकों की सेहत से जुड़े इस मामले में और देरी न हो।
फ्रंट-ऑफ-पैक लेबल क्यों जरूरी है?
गौरतलब है कि इन लेबल्स का मतलब होता है कि किसी भी पैकबंद खाने या ड्रिंक के डिब्बे के बिल्कुल सामने यह साफ-साफ लिखा हो या निशान बना हो कि उस चीज में जरूरत से ज्यादा चीनी, नमक या फैट है या नहीं। इससे आम आदमी दुकान पर सामान खरीदते ही तुरंत समझ जाएगा कि वह जो चीज खा रहा है, वह सेहत के लिए कितनी नुकसानदेह हो सकती है।
