अब इंडस्ट्री को मिलेगी सस्ती बिजली, सरकार ने बदल दिए नियम; क्यों पड़ी इसकी जरूरत?
केंद्र सरकार ने उद्योगों को सस्ती और भरोसेमंद बिजली देने के लिए कैप्टिव पावर प्लांट नियमों में संशोधन किया है। ...और पढ़ें

सत्यापन के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त करने का अधिकार होगा

समय कम है?
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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। उद्योगों को अपनी जरूरत के लिए सस्ती और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने कैप्टिव पावर प्लांट (सीजीपी) से जुड़े नियमों में महत्वपूर्ण संशोधन किया है। सरकार का कहना है कि इससे उद्योगों को खुद बिजली पैदा करने में अधिक सुविधा मिलेगी, लागत कम होगी और स्वच्छ ऊर्जा में निवेश को भी बढ़ावा मिलेगा।
बिजली (संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित करते हुए बिजली कानून, 2005 के नियम-3 में संशोधन किया है। नए नियमों में स्वामित्व की परिभाषा को स्पष्ट किया गया है। इसके तहत अब किसी कंपनी की सहायक कंपनी, होल्डिंग कंपनी या उसी समूह की अन्य कंपनियों को भी स्वामित्व संरचना में शामिल माना जाएगा। इससे कॉरपोरेट समूहों द्वारा स्थापित बिजली परियोजनाओं को कैप्टिव का दर्जा मिलने में आसानी होगी।
कारोबार सुगमता बढ़ेगी
बिजली मंत्रालय का कहना है कि इन संशोधनों से उद्योगों के लिए कारोबार सुगमता बढ़ेगी, नियमों में स्पष्टता आएगी और ज्यादा कंपनियां बिजली बनाने के लिए प्रोत्साहित होंगी। नये नियम का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि कंपनियां और उद्योग अपने उपभोग के लिए जहां तक संभव हो बगैर किसी दिक्कत के बिजली पैदा करे।
चूंकि उद्योग उपभोग के स्थान के निकट ही बिजली बनाएंगी तो इससे ट्रांसमिशन में होने वाला नुकसान कम होगा, सिस्टम की दक्षता बढ़ती है और ग्रिड का इस्तेमाल दूर दराज के इलाकों में बिजली पहुंचाने में किया जाएगा। बिजली (संशोधन) नियम, 2026 अधिसूचित किए गए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कैप्टिव पावर प्लांट्स से जुड़े ढांचे में अधिक स्पष्टता और लचीलापन प्रदान करना है, ताकि उद्योग अपनी आवश्यकतानुसार आसानी से बिजली उत्पन्न कर सकें।
लागत में उतार-चढ़ाव से बचने की तैयारी
सरकार के मुताबिक भारत में उद्योग अपनी बिजली जरूरतों के लिए तेजी से गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा स्त्रोतों की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में कैप्टिव बिजली उत्पादन के लिए स्पष्ट और व्यावहारिक ढांचा तैयार करना जरूरी था ताकि उद्योग बिजली की आपूर्ति में बाधाओं और लागत में उतार-चढ़ाव से बच सकें।
कैप्टिव प्लांट की स्थिति का सत्यापन अब पूरे वित्त वर्ष के आधार पर किया जाएगा। हालांकि स्वामित्व के पहले या अंतिम वर्ष में यह सत्यापन वित्त वर्ष के संबंधित हिस्से के लिए किया जा सकेगा। एक अप्रैल 2026 से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को राज्य के भीतर बिजली उपयोग वाले मामलों के सत्यापन के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त करने का अधिकार होगा।
नेशनल लोड डिस्पैट सेंटर को जिम्मेदारी
अंतर-राज्यीय मामलों में सत्यापन का काम नेशनल लोड डिस्पैट सेंटर (एनएलडीसी) करेगा। विवादों के समाधान के लिए अलग शिकायत निवारण समिति भी बनाई जाएगी। एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स (एओपी) के माध्यम से स्थापित समूह कैप्टिव परियोजनाओं के संचालन में जरूरत पड़ने पर बदलाव करने के नियम आसान बना दिए गए हैं। सदस्यों को उनकी जरूरत के मुताबिक बिजली आवंटन में बदलाव किया जा सकेगा।
नियमों के तहत यदि कैप्टिव उपभोक्ता निर्धारित घोषणा पत्र जमा कर देते हैं तो सत्यापन पूरा होने तक उन पर क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज नहीं लगाया जाएगा। हालांकि यदि बाद में संयंत्र कैप्टिव की श्रेणी में नहीं पाया गया तो ये शुल्क देय होंगे और साथ में लेट पेमेंट सरचार्ज नियमों के अनुसार ब्याज भी देना होगा।
सरकार का कहना है कि इन सुधारों से उद्योगों को अपनी जरूरत के अनुसार बिजली उत्पादन में आसानी होगी, बिजली लागत कम होगी और स्वच्छ ऊर्जा आधारित कैप्टिव परियोजनाओं में निवेश बढ़ेगा।
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