CBT मोड में क्यों आसान नहीं NEET UG परीक्षा? पेपर लीक के बाद उठे सवालों पर शिक्षा मंत्री ने दिया जवाब
नीट-यूजी परीक्षा को कंप्यूटर आधारित टेस्ट मोड में कराने में कई चुनौतियां हैं, जिसमें छात्रों की बड़ी संख्या और सीमित क्षमता प्रमुख है।
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HighLights
नीट-यूजी को सीबीटी मोड में कराने में क्षमता की कमी।
24 लाख छात्रों के लिए 45 से अधिक प्रश्नपत्रों की चुनौती।
नॉर्मलाइजेशन पद्धति पर छात्रों द्वारा सवाल उठाने का डर।
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। नीट-यूजी पेपर लीक की घटना के बाद उठ रहे सवालों को देखते हुए भले ही तत्कालीन शिक्षा मंत्री ने अगले साल से इसे सीबीटी मोड में यानी कंप्यूटर के जरिए कराने का ऐलान कर दिया था, लेकिन देश में सीबीटी के लिए उपलब्ध मौजूदा संसाधनों को देखते हुए शिक्षा मंत्रालय से जुड़े अधिकारी असमंजस में है।
जिसके तहत एक दिन में सीबीटी के जरिए डेढ़ लाख बच्चों की ही परीक्षा कराई जा सकती है। जबकि नीट-यूजी में करीब 24 लाख छात्र आवेदन करते है। ऐसे में यदि सीबीटी के जरिए नीट-यूजी की परीक्षा होती है तो पंद्रह दिन से अधिक का समय लगेगा। ऐसे में नीलकेणि की अध्यक्षता में बने टास्क फोर्स और एनटीए को अगली परीक्षा को लेकर काफी मशक्कत करनी पड़ेगी।
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद शिक्षा मंत्रालय की कमान संभाल रहे प्रह्लाद जोशी को मंत्रालय के अधिकारियों ने पहली बैठक मेंही नीट- यूजी को सीबीटी मोड में कराने से जुड़ी चुनौतियों को साझा किया। वैसे एनटीए अभी जेईई मेन, सीयूईटी-यूजी और यूजीसी नेट जैसी परीक्षाओं को सीबीटी मोड में ही कराती है।
हर साल शामिल होते हैं 24 लाख छात्र
हालांकि, इनमें सीयूईटी यूजी में ही सबसे अधिक करीब 15 लाख बच्चे आवेदन करते है, बाकी की दोनों परीक्षाओं में सात से आठ लाख बच्चे ही हिस्सा लेते है। सूत्रों की नीट-यूजी मामले में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि यदि इसे सीबीटी मोड में कराया गया तो पंद्रह दिनों तक दो या तीन पालियों में होने वाली परीक्षा के लिए प्रश्नपत्र के 45 से अधिक सेट तैयार करने होंगे।
एक पाठ्यक्रम से इतने अधिक प्रश्न पत्रों के सेट तैयार करना इसलिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि प्रश्न पत्रों के एक जैसे होने से विवाद का खतरा बना रहेगा। वहीं किसी पेपर को कठिन या आसान बनाया, तो भी सवाल खडे होंगे।
विशेषज्ञों की मानें तो यदि इसे कई शिफ्टों में कराया गया तो जेईई की तर्ज पर अंकों को बराबर करने के लिए नॉर्मलाइजेशन पद्धति अपनानी होगी। मेडिकल प्रवेश परीक्षा में जहां एक-एक अंक व रैंक का बहुत महत्व होता है, वहां छात्र अक्सर नॉर्मलाइजेशन फार्मूले पर सवाल उठाते हैं और विवाद खड़े होते है।
इसके साथ ही परीक्षा माफिया जिस तरह से परीक्षा में गड़बड़ी करने के लिए लगातार अपने पैटर्न को बदल रहा है, ऐसे में वह सीबीटी के जरिए होने वाली परीक्षा में सेंध लगाने की कोशिश करेगा। वैसे भी सीबीटी मोड में परीक्षा के लिए एनटीए के पास अपना कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, उसकी निर्भरता निजी एजेंसियों पर है।
परीक्षा माफिया के निशाने पर रहती है नीट-यूजी
नीट-यूजी पर परीक्षा माफिया की नजर इसलिए भी रहती है, क्योंकि यहां छात्रों के बीच असली प्रतिस्पर्धा सरकारी मेडिकल कालेजों में दाखिला पाने की होती है। इसकी वजह निजी मेडिकल कालेजों के मुकाबले सरकारी मेडिकल कालेजों का फीस का बेहद कम होना है। उदाहरण के तौर पर एम्स में जहां सात से आठ हजार रुपए सालाना फीस लगती है, वहीं निजी मेडिकल कालेजों में फीस आदि पर खर्च सालाना 20 लाख रुपए तक का होता है।
वहीं एम्स में एमबीबीएस की पूरी साढ़े पांच लाख पढ़ाई जहां 40 से 50 हजार रूपए में हो जाती है, वहीं निजी मेडिकल कालेजों में एक करोड़ तक खर्च आता है। विशेषज्ञों की मानें तो इंजीनियरिंग में यह स्थिति नहीं दिखती है, क्योंकि आईआईटी जैसे संस्थानों की जो फीस है, उतनी ही फीस पर अच्छे निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में भी छात्रों को दाखिला मिल जाता है।
