माला दीक्षित, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दाखिल हुई है जिसमें निर्भया कांड के चारो दोषियों को मेडिकल रिसर्च के लिए शरीर और अंग दान करने का विकल्प देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि सरकार और जेल अथारटीज को निर्देश दिया जाए कि वह चारो दोषियों को शरीर और अंग दान का विकल्प दें। दाखिल याचिका में मृत्युदंड पाए कैदियों व अन्य कैदियों के अंग दान के बारे में एक नीति बनाए जाने की भी मांग की गई है। कहा गया है कि इसके लिए जेल नियमों में जरूरी बदलाव करने का निर्देश दिया जाए।

यह याचिका शुक्रवार को पंजीकृत तो हो गई है लेकिन अभी इस पर सुनवाई की तिथि तय नहीं है। यह याचिका वकील कमलेन्द्र मिश्रा के जरिए सेवानिवृत न्यायाधीश माइकल एफ सलदाना और एक अन्य ने दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि भारत में अंग दान की भारी कमी है। याचिका में दुनिया के कुछ देशों में मृत्युदंड व अन्य कैदियों के अंग दान की नीति की भी चर्चा की गई है और भारत में भी उस तरह की नीति बनाए जाने की बात कही गई है।

दिसंबर 2012 के दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म कांड की घटना और उसकी जघन्यता का जिक्र करते हुए कहा गया है कि इसके चारो दोषियों को कानून के मुताबिक फांसी होने वाली है, ऐसे में उन्हें अंग दान के रूप में पश्चाताप का अंतिम मौका दिया जा सकता है। इससे न सिर्फ उन लोगों ने जो गलत किया है उसकी कुछ भरपाई होगी बल्कि उन लोगों की भी एक मदद होगी जिन्हें अंग प्रत्यारोपण की बेहद जरूरत है। जस्टिस सलदाना ने याचिका में कहा है कि जब वह मुंबई और कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश थे तब कुछ मौकों पर उन्होंने दोषी की मौत की सजा को सही ठहराने वाले फैसले में यह भी निर्देश दिया था कि मेडिकल रिसर्च के लिए शरीर दान करने और अंग दान करने विशेषकर आंख, किडनी, लीवर, दिल आदि जो अंग सही हों उन्हें दान करने का दोषी को विकल्प दिया जाए। इससे कुछ जरूरतमंद लोगों को जिंदगी मिल सकती है।

जब मृत्युदंड पाए दोषी ने कोर्ट से मांगी थी अंग दान की इजाजत

जस्टिस सलदाना ने एक घटना का जिक्र किया है जिसमें अपील पर सुनवाई के दौरान विशेष इजाजत के तहत कोर्ट में मौजूद दोषी ने कोर्ट के मृत्युदंड पर मुहर लगाए जाते ही कहा था कि वह अब आगे अपील करने का इच्छुक नहीं है क्योंकि उसने जितनी जघन्यता से तीन लोगों की हत्या की है, उसे यही सजा मिलनी चाहिए थी। हालांकि उसने कोर्ट से अनुरोध किया कि उसे अंग दान की इजाजत दी जाए और कोर्ट ने इस पर सरकार व जेल अथारिटी को संज्ञान लेने को कहा था। मृत्युदंड के बाद उसके अंग निकाले गए और बाद में रिपोर्ट आयी कि सभी अंग जरूरतमंदों को लगाए गए।

चीन,सिंगापुर,फ्रांस,ताइवान में है नीति

याचिका में कहा गया है कि भारत में अंग दान पूरी तरह ऐच्छिक है यहां किसी तरह की जबरदस्ती नहीं है इसलिए अंग दान की हमेशा कमी रहती है। एशिया के देश जैसे चीन, सिंगापुर, फ्रांस, और ताइवान में मृत्युदंड पाए दोषियों के मृत्युदंड दिये जाने के बाद उनके अंग प्रत्यारोपण के लिए दिये जाने की इजाजत है। यह चीज एक तरह से दोषी को पश्चाताप का मौका देती है। कहा गया है कि भारत सहित दुनिया के 69 देशों में मृत्युदंड है। कहा गया है कि जिन देशों में मृत्यु के बाद जरूरी अंगदान की नीति है वहां अंग के लिए कमी नहीं रहती। याचिका में उन देशों के नाम भी दिये गये हैं। कहा गया है कि हमारे देश में अंगदान की ऐसी नीति न होने के कारण हमेशा प्रत्यारोपण के लिए अंगों की कमी रहती है।

कहा गया है कि देश के कुछ राज्यों जैसे दिल्ली, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, केरल, तमिलनाडु, आदि में लावारिश शवों के अंग मेडिकल रिसर्च और प्रत्यारोपण के लिए देने का कानूनी प्रावधान है। कहा गया है कि नीति बनाई जाए जिसमें मृत्युदंड पाए दोषी और कैदियों के मरने पर उनके अंग दान किये जाएं। इसके लिए उचित सुरक्षात्मक उपाय भी अपनाए जाएं। एक पैनल होना चाहिए जो कि अंग दान की प्रमाणिकता पर निर्णय ले।

Posted By: Sanjeev Tiwari

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