संजीव कुमार मिश्र। गांव, शाहपुर जाट। इसके इतिहास में झांकेंगे तो 900 साल पहले, हरियाणा के इंद्री गांव का एक डागर कबीला शाहपुर जाट गांव स्थानांतरित हुआ। शाह माने (धन) पुर माने (कॉलोनी) और जाट माने एक कबीला...ऐसा तब कहा जाता था, जिसका विशुद्ध अर्थ हुआ अमीर जाटों का इलाका। यहां के कुछ हवेली नुमा घरों को देखकर ऐसी अनुभूति भी होती है। हालांकि अब छोटी-छोटी गलियों के भीतर बड़े-बड़े फैशन डिजाइनर के शोरूम बन गए हैं। सिने जगत बड़े ड्रेस डिजाइनर्स के डिजाइंस यहां मिल जाएंगे।

बहरहाल गांव के इतिहास की परतों को पलटने से पहले आज से शुरू हो रहे आयोजन से रूबरू होते हैं जिसके लिए तोहफा वाला गुंबद परिसर में तैयारी हो रही है। सफाई हो चुकी है। पूरे गांव में उत्सव का माहौल नजर आता है। महिलाएं विशेष तैयारी में जुटी हैं आखिर उन्हें फैशन शो में हिस्सा जो लेना है। दिल्ली सरकार द्वारा मनाए जा रहे शरद उत्सव के लिए इस स्थान का चयन भी विशेष तौर भी किया गया है। चूंकि आयोजन में 14 वीं शताब्दी के स्मारक के खंडहरों की यात्रा से लेकर गांव के बुजुर्गों के साथ मॉडल के रूप में एक फैशन शो के रूप में छाप छोडऩे की तैयारी है। तभी तो उत्सव की टैगलाइन भी कुछ ऐसी है...'जब फैशन इतिहास से मिलता है'।

तोहफा वाला गुंबद एक हेरिटेज वॉक

शाहपुर जाट एक प्राचीन गांव है, जिसका दिलचस्प इतिहास है और वर्तमान में यह गांव फैशन हब के रूप में अतुलनीय पहचान बनाए हुए है। यह उत्सव इन दोनों का ही मिश्रण होगा। तोहफा वाला गुंबद पर एक हेरिटेज वॉक कराई जाएगी जो अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल के दौरान 1303 में निर्मित सिरी किले का एक हिस्सा था, साथ ही यहां एक दिवाली बाजार भी लगेगा। तोहफा वाला गुंबद के खंडहरों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संरक्षित कर रहा है। इसका एक आयोजन इसी गुंबद के सामने वाले नगर निगम के पार्क में भी होगा। वॉक के अलावा दिवाली बाजार में गांव के ही कुम्हार, मूक बधिर और पारंपरिक बुनकरों के उत्पाद प्रदर्शित किए जाएंगे।

कला और संस्कृति का संगम

शाहपुर जाट गांव की शान दिल्ली क्या देश-विदेश में सभी जगह एक अलग फैशन की छाप छोड़ती है। मुंबई से लेकर विदेश तक के लोगों की चहल-पहल यहां सामान्य है। चूंकि गलियों में कहीं बड़े बुटीक हैं और कहीं ब्रांडेड शोरूम। एक और खास बात आपको यहां दिखेगी यहां की सड़कों के नाम भी अद्भुत हैं दादा जंगी लेन, बॉलीवुड लेन, मेरे पास मां है लेन, स्क्वेयर रंगोली लेन, फैशन स्ट्रीट की सड़क आदि आदि। फैशन स्ट्रीट में प्रवेश करते ही मन नारंगी रंग में रंगने लगता है। गली की दोनों ओर नारंगी रंग में रंगी दीवारें आकर्षित करती हैं और यहां घरों के दरवाजों को भी एंटीक लुक दिया गया है जिनमें बुटीक सजाए गए हैं। यहां तकरीबन सभी बुटीक के अपने खरीददार हैं। दो दिन इसी जगह न सिर्फ दिल्ली की बल्कि विदेशी पर्यटकों से भी शरद उत्सव की महफिल सजेगी। 19 अक्टूबर, शनिवार यानी आज हरियाणवी और पंजाबी लोकनृत्यों का आनंद होगा और हास्य कवि सुनील जोगी, स्टैंडअप कामेडियन संजय राजौरा दर्शकों को लोटपोट कर देंगे। वहीं रविवार को एक विशेष फैशन शो आयोजित होगा। बालीवुड सिंगर मोनाली ठाकुर की दिलकश आवाज भी सुनने को मिलेगी।

फैशन का धनी गांव

शाहपुर जाट गांव की दादा जंगी हाउस लेन में करीब 40 बुटीक हैं। इस लेन का नाम दादा जंगी सुन लोग चौंकते हैं और इसके बारे में जानने को उत्सुक होते हैं। बताते हैं कि यह नाम यहां रहने वाले दादा हेत राम के नाम पर पड़ा। दादा हेत राम ने कई लड़ाई लड़ीं। वे फौज में थे। इसलिए उनका नाम दादा जंगी रख दिया गया। इस लेन में अपना फैशन बुटीक चलाने वाली ईशा बताती हैं कि हर डिजाइनर की अपनी एक अलग पहचान होती है। वो उसी हिसाब से अपने डिजाइन तय करता है। लेकिन दुबई में ज्यादातर गाउन चलता है इसलिए यहां बड़ी तादाद में डिजाइनर गाउन तैयार किए जाते हैं।

यहां की कॉलर वाली शर्ट, नेहरु कट वाली जैकेट, चाइनीज कॉलर, वेलवेट जैकेट, रॉयल हैरिटेज में जोधपुरी पैंट, बंद गले के शॉर्ट जैकेट, प्वाइंटेड बैली शूज खूब मशहूर हैं। शादी का अवसर हो या घर-दफ्तर का कोई और फंक्शन लोग यहां से शापिंग करना पसंद करते हैं। इसके अलावा सिल्क की साडिय़ां, जामवार और ब्रोकेड, फ्यूजन के साथ ईवङ्क्षनग गाउन, ब्रोकेड और सिल्क की जैकेट मिक्स एंड मैच फैब्रिक के साथ, लांग लेंथ अनारकली, मिक्स एंड मैच श्रग्स, डिजिटल प्रिंट, शॉर्ट और एंकल लेंथ स्कर्ट, लांग जैकेट, सिमिट्रिकल डिजाइन, पैनल जैकेट ट्रेंड भी पसंद आते हैं। फैशन की बात हो रही हो वो भी शाहपुर जाट की गलियों में और रितू बेरी का नाम ना आए तो बेमानी होगी। रितू बेरी ने भी अपने करियर की शुरुआत इसी गांव से की थी। बेरी ने अपना पहला बुटिक यहीं खोला था। अभिनेत्री पूनम ढिल्लो, बॉलीवुड की बहुत सी अभिनेत्री अपनी ड्रेस यहीं डिजाइन कराती हैं। दिल्ली में रहने वाली नफीसा अली भी यहां खरीददारी करती हैं। लेकिन यहां का ज्यादातर काम विदेशी आर्डर के लिए किया जाता है।

विदेशों में मिली पहचान

शाहपुर जाट दुनिया के फैशन इंडस्ट्री में एक खास मकाम बना चुका है। यहां तकरीबन सभी डिजाइनर के क्लाइंट दुबई, हॉगकांग, यूरोपियन देशों में है। फिल्म इंडस्ट्री के भी कई लोग अपने कॉस्टयूम यही तैयार करवाते हैं। आज से करीब बीस साल पहले इस गांव में दो ही बुटीक थे। इस गांव में बंगाली कढ़ाई करने वाले लोग तो पहले से ही रहा करते थे, लेकिन तब यहां पर दिल्ली के दूसरे स्थानों से इन कारीगरों को काम मिला करता था। आज तस्वीर बदल चुकी है। यहां तकरीबन चार हजार से ज्यादा बंगाली कारीगर आ बसे हैं। इसके अलावा रंगरेजों की भी कई दुकाने यहां खुल चुकी हैं। यहां हर गली के मोड़ पर रंगरेज मिल जाएंगे। और तकरीबन 150 बुटीक हैं। कुछ नामी डिजाइनर हैं तो कुछ नए डिजाइनर। दुनिया के नक्शे में फैशन हब के रूप में शाहपुर जाट का नाम शुमार है।

अमीर जाटों का इलाका

यूं तो गांव का कोई लिखित इतिहास नहीं मिलता लेकिन इतिहास के जानकारों की मानें तो पता चलता है कि 10,000 साल पहले (8000 ईसा पूर्व), कुछ हिंदू राजाओं ने इस क्षेत्र की स्थापना की, जहां, वर्तमान शाहपुर जाट स्थित है। यहां एक किला और महल था। हालांकि 5000 साल पहले जब पांडवों ने इंद्रप्रस्थ बनाया था, वे उस किले के पत्थर ले गए। तोमर (हिंदू जाट वंश) ने 11 वीं शताब्दी ईस्वी में दिल्ली पर शासन किया, 12 वीं शताब्दी ईस्वी में, पृथ्वीराज चौहान शासक था, उसी सदी में मुस्लिमों द्वारा हिंदू शासन की जगह ले ली गई।

अलाउद्दीन खिलजी ने 1303 में दिल्ली के पहले मुस्लिम शहर सिरीफोर्ट की स्थापना की थी। यह बहुत ही समृद्ध था लेकिन बाद के शासकों ने अपने महल आदि बनवाने के लिए सिरी की निर्माण सामग्री के उपयोग के चक्कर में इसे तबाह कर दिय। आज, इसकी दीवारों के कुछ हिस्सों, चूने, मस्जिदों और कुछ ऐतिहासिक अवशेषों के साथ बनी हवेलियां गांव में मौजूद हैं। लगभग 900 सौ साल पहले, हरियाणा का इंद्री गांव-एक डागर कबीला शाहपुर जाट गांव स्थानांतरित हो गया। उपजाऊ भूमि और उनके कृषि कौशल ने उन्हें कुछ ही समय में धन संचय करने में मदद की, पंवार कबीले और अन्य जातियों को उस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया, जिसे तब तक शाह (धन) पुर (कॉलोनी) जाट (एक कबीला) कहा जाता था, जिसका अर्थ अमीर जाटों का इलाका था। इस तरह इसका नाम शाहपुर जाट पड़ा।

तुगलक की वास्तुकला का नायाब नमूना

इतिहासकार राना सफवी कहती हैं कि तोहफेवाला गुंबद खिलजी और तुगलक की वास्तुकला की याद दिलाती है। एकदम शांत माहौल में यह अलंकृत दिखती है। यह चारों ओर से बढ़ती हुई जंगली घास के साथ एक अनपेक्षित आंगन के अंदर है, लेकिन अभी तक कम से कम किसी ने अंदर अतिक्रमण नहीं किया है। अंदर और गुंबददार, मेहराबदार कोने पर गुंबद के निचले हिस्से में हैं। बाहर, गुंबद एक अष्टकोणीय ड्रम पर है। तीन तीन धनुषाकार आकृतियां शामिल हैं। मेहराब के सामने वाला भाग तीन धनुषाकार प्रवेश द्वार है, जबकि दूसरे दो कक्ष में दो छोटे धनुषाकार प्रवेश द्वार हैं और मध्य प्रवेश द्वार के स्थान पर एक तालाबंद मेहराबदार है। दक्षिणी सिरे पर पहले एक सीढ़ी भी थी। जो टॉप पर ले जाती थी लेकिन अब नहीं दिखती। इसी गुंबद में हेरिटेज वॉक का भी आयोजन किया जाएगा।

Posted By: Sanjay Pokhriyal

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप