कौशल किशोर। केंद्र की सत्ता में दोबारा आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्रालय को जल शक्ति मंत्रालय में बदल कर एक नया संकेत दिया। जिस देश में गंगा, यमुना, नर्मदा जैसी तमाम नदियों को देवियों और जल को वरुण देव की तरह मानने की परंपरा हो, वहां इसे संसाधन समझने की औपनिवेशिक मानसिकता को खारिज करने की अपनी ही अहमियत है। हमें यह समझना होगा कि जलशक्ति को लोकहित में प्रयोग करने के लिए इसे संसाधन के तौर पर देखने के बदले पारंपरिक दृष्टिकोण ही बेहतर है। एक दशक पहले बिहार में आई बाढ़ पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अनुपम मिश्र ने उस समय लिखा था, ‘तैरने वाला समाज डूब रहा है।’

इसमें उन्होंने कठौती में गंगा समेटने की गांवों की उसी संस्कृति का जिक्र किया, जिसमें जलस्नोतों को सहेजने का साल भर चलने वाले कार्यक्रम ही परंपराएं कहलाती हैं। बारिश की रजत बूंदों का स्वागत करने वाले मगध के निवासियों की तैयारियां आहर-पईन जैसी ठेठ देशी व्यवस्था में दिखती है। जल शक्ति के आह्वान के साथ ही गंगा सफाई और जल संरक्षण के क्षेत्र में सेवा करने वाले लोगों को प्रोत्साहित करने का काम दिखने लगा है। लोग व सरकार के बीच का सामंजस्य गंगा की निर्मलता व भूजल स्तर को उन्नत करने में मददगार हो सकता है।

आगरा के दयालबाग में इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे शिव रत्न अग्रवाल ने मल-जल साफ करने का छोटा और विकेंद्रीत सिस्टम विकसित किया। उनके संस्थान ने देश के अलग-अलग हिस्सों में सरकारी व गैर-सरकारी क्षेत्र में सफलता हासिल की और अपने प्लांट्स का रखरखाव आज भी कर रहे हैं। इस तकनीक को बढ़ावा देने से मातृभूमि को प्रदूषण की जटिल समस्या से थोड़ी राहत मिलती है। साथ ही ऐसा करने से सीवर लाइन और ट्रीटमेंट प्लांट के राजनीतिक अर्थशास्त्र पर कुठाराघात होता है। वह संघ परिवार और उमा भारती व नितिन गडकरी से करीबी रखने के बावजूद कोई उपलब्धि नहीं हासिल करते हैं। सरकार व इंजीनियरिंग संस्थान इस वैज्ञानिक के साथ समय रहते समन्वय कायम कर यदि प्रभावी काम करे तो संबंधित समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।

गोपी दत्त आकाश पुष्पांजलि कलश को मूर्त रूप देते हैं। उन्होंने निर्माल्य को अपसाइकल किया। कर्मकांड से सृजित अपशिष्ट से धूप, इत्र, अगरबत्ती जैसी डेढ़ दर्जन काम की चीजें बना कर दुनिया भर से प्रशंसा हासिल की है, परंतु जलस्नोतों को मूर्ति और निर्माल्य के विसर्जन से मुक्ति नहीं मिली। आज ‘प्रयास’ और ‘यूथ फ्रेटरनिटी फाउंडेशन’ जैसी गैर-सरकारी संस्थाएं एक तकनीक से उत्पन्न समस्या को दूसरी तकनीक से दूर करने का मार्ग पेश करती हैं।

इनकी सफलता भारत में मेक्सिको के विशेषज्ञ गुस्ताव स्टीवा के अभिनव प्रयोगों की तरह कारगर होगा, ऐसा कहना संभव भी नहीं है। भले ही ‘स्वच्छ गंगा’ और ‘नमामि देवि नर्मदे’ जैसे नारों को बुलंद करने में इनके कार्यो से बल ही मिले। दरअसल प्रदूषण निवारण के विशाल व्यापार में लगी पूंजी व रूढ़ियों में जकड़े कई पंथों के रूठने का भय हावी है। इस बार मानसून के आगमन के समय हमने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के जलस्नोतों का अध्ययन आंरभ किया। दिल्ली एनसीआर के गाजियाबाद के करीब 111 आधे-अधूरे खुदे तालाबों से लेकर फरीदाबाद की बड़खल झील तक का यह अध्ययन अब पूरा हो गया है।

कमोबेश इन जलाशयों की दशा दिल्ली के दिल में धड़कती ठीक उसी झील की तरह है, जो दो दशक पहले तक रोशनारा बाग की शान मानी जाती थी। उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने एक अर्से बाद इसके पेट में उगे जंगलों को साफ करने का काम किया। ऐसा लगा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा जल शक्ति का आह्वान करने का असर पड़ा है। लेकिन वास्तविकता यह है कि बरसात बीतने पर इसके पेट में एक बूंद भी पानी नहीं है। फिर से आदमकद झाड़ उग आए हैं।

यह हरियाली साफ कहती है कि सभी सपने आसानी से साकार नहीं होते। फरीद की नगरी के सूरज कुंड को सदियों से सहेजने वाली परंपराओं के मतलब भी यहां मौजूद लोग अब भूल गए हैं। यमुना में आई बाढ़ के पानी से बड़खल समेत इन तमाम खलों को जल प्लावित किया जा सकता था। अपने देश में नदी के जल से सरोवर भरने की समृद्धि पूर्वजों की विरासत है। हालात नई सभ्यता और पुरानी संस्कृति के द्वंद्व को बखूबी स्पष्ट करते हैं। जलशक्ति और जनशक्ति के बीच का ये समन्वय क्या इसके सही समीकरण की पोल खोल सकता है? बाबुओं व नेताओं को इस पर आपस में चर्चा करनी चाहिए।

सुदूर गांवों में बिजली पहुंचाने वाली मोदी सरकार ने पेयजल की आपूर्ति करने की नई शक्ति का आह्वान किया है। गांवों में पीने का पानी पहुंचाने की यह करीब साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये की परियोजना है। इस मामले में प्रशासन ठीक उसी दक्षता से लगा हुआ है, जैसाकि 1949 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ने विकास के सपनों को पंख लगाते हुए किया था। यह विकास पहुंचने से पहले ही देश और गांव को अविकसित करार देता है और पहुंचने के बाद खोखला करके दम लेता है। इस पीने के पानी की कहानी ही देख लीजिए।

अब तक जिन स्थानों पर भी यह पानी पहुंचाने की व्यवस्था पहुंची है, वहां के प्राय: सभी जलस्नोत नष्ट हो गए। आज यह दावा तो किया जा सकता है कि ऐसा इन गांवों में नहीं होगा, पर होगा वही जो होता रहा है। मानसून की आर्द्रता ग्रीष्म और शरद ऋतुओं के बीच सेतु का काम करती है। मौसम की भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद विविधता रूस, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के नसीब में भी नहीं है। विविधताओं से परिपूर्ण देशी संस्कृतियों में पहली समानता जलस्नोतों को जीवनस्नोतों की तरह सहेजने की है।

प्राचीन नगरों और सेल्फी युग से पहले के गांवों की बसावट में दो साम्यताएं थीं। गांवों-मोहल्लों के लोगों में आपसी जान-पहचान थी। सभी को जल संरक्षण का अर्थशास्त्र पता था। लोग आपस में इस बारे में चर्चा करते थे। अब ये दोनों ही बातें लगभग खत्म हो चुकी हैं और इनका असर भी जल संरक्षण पर पड़ रहा है। नई सभ्यता की यही पहचान है कि यह संस्कृतियों पर आश्रित परजीवी है। जलशक्ति व जनशक्ति की रिश्तेदारी में व्यस्त लोग यदि इसे नजरअंदाज करते हैं तो जल संकट और गहरा होगा।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

Posted By: Kamal Verma

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