स्लीपर कोच में बंदूक की नोक पर यात्रियों से लूट, NCDRC ने रेलवे के ठहराया जिम्मेदार; 20000 रुपए मुआवजे का आदेश
नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने 2004 में एक रिजर्व्ड स्लीपर कोच में हुई लूटपाट के मामले में रेलवे को सेवा में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

स्लीपर कोच में बंदूक की नोक पर यात्रियों से लूट। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)
HighLights
NCDRC ने 2004 की ट्रेन लूट में रेलवे को दोषी माना।
यात्रियों को सेवा में कमी के लिए 20,000 रुपये मुआवजा मिलेगा।
सुरक्षा चूक के कारण रेलवे पर लगा जुर्माना, यात्रियों को राहत।
डिडिटल डेस्क, नई दिल्ली। नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने 2004 में एक रिजर्व्ड स्लीपर कोच के अंदर हथियारबंद बदमाशों द्वारा बंदूक की नोक पर यात्रियों से लूटपाट के मामले में सेवा की कमी के लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया है।
कमीशन ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह नुकसान, सेवा में कमी, मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए यात्रियों को 20,000 रुपये का भुगतान करे। यह आदेश 31 अगस्त, 2026 को सुनाया गया था।
यात्री कंज्यूमर फोरम के पास क्यों गए?
NCDRC के आदेश के अनुसार, सुरेंद्र पाल सिंह और उनकी बेटी प्रीति 28 अगस्त, 2004 को अवध-असम एक्सप्रेस के S-8 कोच में हापुड़ से गुवाहाटी की यात्रा कर रहे थे। जब ट्रेन असम में बारपेटा और रंगिया के बीच चल रही थी, तो कथित तौर पर छह से सात हथियारबंद लुटेरे रिजर्व्ड स्लीपर कोच में घुस गए और बंदूक की नोक पर यात्रियों से लूटपाट की।
पिता-पुत्री की जोड़ी ने आरोप लगाया कि उनसे कुल 59,725 रुपये मूल्य की नकदी, गहने और एक टाइटन कलाई घड़ी लूट ली गई। उन्होंने यह भी दावा किया कि लूट के समय कोई कोच अटेंडेंट, सुरक्षा एस्कॉर्ट या रेलवे सुरक्षा कर्मी मौजूद नहीं था। ट्रेन के रंगिया पहुंचने के बाद यात्रियों ने रेलवे पुलिस को घटना की सूचना दी।
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 395 के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके बाद यात्रियों ने बरेली जिला कंज्यूमर फोरम का रुख किया और घटना के कारण हुए आर्थिक नुकसान के साथ-साथ मानसिक और शारीरिक पीड़ा के लिए मुआवजे की मांग की। जिला फोरम ने रेलवे को ब्याज सहित 65,000 रुपये और कानूनी खर्च के तौर पर 3,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया।
हालांकि, बाद में राज्य आयोग ने इस आदेश को रद कर दिया और कहा कि ट्रेन में लूटपाट रेलवे अधिनियम के तहत एक अप्रिय घटना है। आयोग ने कहा कि इस मामले से निपटने का अधिकार कंज्यूमर फोरम के बजाय रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के पास है।
यात्रियों ने राज्य आयोग के फैसले को दी चुनौती
इसके बाद यात्रियों ने NCDRC के समक्ष राज्य आयोग के फैसले को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि उनकी शिकायत केवल लूटपाट के मुआवजे के बारे में नहीं थी। इसके बजाय, उनका आरोप था कि रेलवे रिजर्व्ड कोच में उचित सुरक्षा और हिफाजत देने में नाकाम रहा। रेलवे ने इस याचिका का विरोध किया। उन्होंने रेलवे एक्ट और रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल एक्ट के प्रावधानों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कंज्यूमर फोरम के पास इस मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है।
रेलवे की जिम्मेदारी पर NCDRC ने क्या कहा?
NCDRC के प्रेसिडेंट जस्टिस एपी साही और सदस्य भरतकुमार पांड्या की बेंच ने इस बात की जांच की कि क्या यात्रियों की शिकायत लूट की घटना के बारे में थी या रेलवे द्वारा उचित सुरक्षा न दे पाने की नाकामी के बारे में। कमीशन ने अनचाही घटना से जुड़े दावे और रेलवे सेवाओं में लापरवाही या कमी के आरोप वाली कंज्यूमर शिकायत के बीच अंतर स्पष्ट किया।
NCDRC ने माना कि यात्री रिजर्व्ड स्लीपर कोच में यात्रा कर रहे असली टिकट-धारक थे और इसलिए उन्हें अपनी यात्रा के दौरान सुरक्षा की उचित उम्मीद थी। कमीशन ने यह भी माना कि कंज्यूमर कानून यात्रियों के लिए उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों के अलावा एक और उपाय प्रदान कर सकता है।
NCDRC ने रेलवे सर्विस में कमी क्यों मानी?
NCDRC ने कहा कि रिजर्व्ड स्लीपर कोच में यात्रा करने वाले यात्रियों की यह जायज उम्मीद थी कि सुरक्षा के उचित इंतजाम होंगे। आयोग ने इस आरोप पर ध्यान दिया कि घटना के समय कोच में कोई अटेंडेंट या सिक्योरिटी एस्कॉर्ट नहीं था। आयोग ने इस दावे पर भी विचार किया कि लुटेरे भागने से पहले काफी देर तक कोच के अंदर रहे थे।
चोरी हुए सामान के बारे में NCDRC ने क्या कहा?
आयोग ने यात्रियों के उस दावे की भी जांच की जिसमें कहा गया था कि 59,725 रुपये की कीमत का कैश, गहने और टाइटन की घड़ी चोरी हो गई थी। आयोग ने चोरी हुए सामान की कीमत के आकलन में अंतर, सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स से जुड़े सवालों और इस तथ्य पर ध्यान दिया कि सामान कभी बरामद नहीं हुआ। NCDRC ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि क्रिमिनल केस बिना किसी सजा के खत्म हो गया था।
NCDRC ने यात्रियों को दिए जाने वाले मुआवजे में बदलाव किया
NCDRC ने राज्य आयोग के 2015 के आदेश को रद कर दिया और जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा दिए गए मुआवजे में बदलाव किया। जिला फोरम द्वारा दिए गए 65,000 रुपये के बजाय, आयोग ने रेलवे को यात्रियों को कुल 20,000 रुपये की राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया।
इस राशि में यात्रियों को हुए नुकसान, सेवा में कमी, मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च शामिल हैं। रेलवे को दो महीने के भीतर यह राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है। यदि तय समय के भीतर भुगतान नहीं किया जाता है, तो भुगतान होने तक इस राशि पर 6% प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज लगेगा।
