नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। समलैंगिकों के अधिकारों की कानूनी लड़ाई लड़ने वाले गैर सरकारी संगठन नाज फाउंडेशन ने भी समलैंगिकता को अपराध घोषित करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी है। नाज फाउंडेशन ने पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई होने तक समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाले सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर अंतरिम रोक लगाने की भी मांग की है। केंद्र सरकार पहले ही पुनर्विचार दाखिल कर चुकी है। नाज फाउंडेशन इस मामले में मूल याचिकाकर्ता है। इसी संगठन ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिस पर हाईकोर्ट ने दो वयस्कों के बीच एकांत में बनाए गए समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने गत 11 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट का जुलाई 2009 का वह फैसला रद कर दिया था और आईपीसी की धारा 377 को वैधानिक ठहराया है। सुप्रीमकोर्ट के फैसले के बाद एक बार फिर समलैंगिक संबंध अपराध की श्रेणी में आ गए हैं।

नाज फाउंडेशन ने सुप्रीमकोर्ट से पुनर्विचार याचिका पर खुली अदालत में मौखिक सुनवाई का भी अनुरोध किया है। पुनर्विचार याचिका में कहा गया है कि सुप्रीमकोर्ट का फैसला ठीक नहीं है। उसमें खामी है। दो वयस्कों के बीच एकांत में बनाए गए समलैंगिक संबंधों को धारा 377 के तहत अपराध घोषित से संविधान में मिले समानता, निजता, स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है। फैसले के बाद समलैंगिक व किन्नर प्रताड़ना के शिकार होंगे। फैसला देते समय सुप्रीमकोर्ट ने स्वास्थ्य मंत्रालय की इस दलील पर विचार नहीं किया कि समलैंगिक संबंधों को अपराध मानने से आपस में समलैंगिक संबंध बनाने वाले पुरुष सामने नहीं आएंगे और इससे एचआइवी एडस रोकने के प्रयासों को धक्का लगेगा।

कोर्ट ने फैसला देते समय संगठन की ओर से की गई बहस व पेश की गई सामग्री पर पूरी तरह गौर नही किया। कोर्ट का यह कहना कि धारणा हमेशा कानून को वैधानिक मानने की होती है, ठीक नहीं है क्योंकि हाईकोर्ट कानून को रद घोषित कर चुका था। यह कहना भी ठीक नहीं है कि सरकार को कानून में संशोधन करना चाहिए था, क्योंकि जब हाईकोर्ट ने धारा 377 के उस अंश को रद कर अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था तो सरकार को कानून में संशोधन करने की कोई जरूरत नहीं थी। हाईकोर्ट का फैसला ही कानून था। ऐसा ही आईपीसी की धारा 303 की वैधानिकता के बारे हुआ है। सुप्रीमकोर्ट ने हत्या के अपराध में फांसी की सजा देने की अनिवार्यता वाली इन धारा को मित्थू बनाम पंजाब राज्य के मामले में निरस्त कर दिया था। आज तक कोर्ट का वह फैसला लागू है, संसद ने उसके बारे में कानून में संशोधन नहीं किया।

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