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रैमिंग: नौसैनिक लड़ाइयों का रुख मोड़ने वाली सदियों पुरानी रणनीति

Published: Wed, 16 Sep 2026 11:32 PM (IST)

समुद्री युद्ध में जहाजों को टक्कर मारने की सदियों पुरानी 'रैमिंग' रणनीति अब 'ग्रे-जोन वारफेयर' के रूप में लौट आई है।

नौसैनिक लड़ाइयों का रुख मोड़ने वाली सदियों पुरानी रणनीति।  (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

नौसैनिक लड़ाइयों का रुख मोड़ने वाली सदियों पुरानी रणनीति। (यह तस्वीर एआई द्वारा बनाई गई है)

HighLights

  1. रैमिंग: सदियों पुरानी नौसैनिक रणनीति, अब 'ग्रे-जोन वारफेयर' में वापसी।

  2. पाकिस्तान चीन की तर्ज पर 'ग्रे-जोन' युद्धनीति अपना रहा है।

  3. भारत-पाक नौसैनिक टक्कर ने 1991 के द्विपक्षीय समझौते का उल्लंघन किया।

जागरण न्यूज नेटवर्क, नई दिल्ली। समुद्र के सीने पर जंग लड़ने की रणनीति उतनी ही पुरानी है, जितना कि खुद नौसैनिक इतिहास। एक जहाज से दूसरे जहाज को सीधे टक्कर मारकर डुबाने की यह रणनीति - जिसे 'रैमिंग' कहा जाता है - प्राचीन काल से यूनानियों और रोमनों की युद्धक शैली का मुख्य स्तंभ रही है।

प्राचीन ग्रीक और रोमन नाविकों ने इसके लिए विशेष युद्धपोत तैयार किए थे। हालांकि, प्राचीन चीन में चपटे पेंदे वाले जहाजों की बनावट के कारण यह तकनीक कभी लोकप्रिय नहीं हो पाई। समुद्र में एक पोत द्वारा दूसरे पोत को टक्कर मारना केवल एक रणनीति नहीं, बल्कि सदियों पुराना ऐसा 'हथियार' है जिसने अनगिनत नौसैनिक लड़ाइयों का रुख मोड़ा है।

आधुनिक युद्धक जहाजों के बीच रैमिंग का पहला बड़ा उदाहरण 1862 के अमेरिकी गृहयुद्ध के दौरान 'बैटल आफ हैम्पटन रोड्स' में देखने को मिला था। दोनों विश्व युद्धों के दौरान भी यह तरीका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुआ। यहां तक कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी द्वारा कमांड किए गए पोत 'पीटी-109' का अंत भी इसी तकनीक से हुआ था।

इसके अलावा, उत्तर अटलांटिक में मछली पकड़ने के अधिकारों को लेकर ब्रिटेन और आइसलैंड के बीच हुए 'कोड वार्स' में भी जहाजों की यह टक्कर एक नाटकीय रूप में सामने आई थी।

चीन की तर्ज पर पाकिस्तान का 'ग्रे-जोन वारफेयर'

आज के दौर में यही पुरानी आक्रामक रणनीति एक नए और खतरनाक रूप में लौट आई है। चीन जिस तरह दक्षिण चीन सागर में अपने तटरक्षक जहाजों और समुद्री मिलिशिया के जरिये 'ग्रे-जोन' युद्धनीति का इस्तेमाल करता है - यानी खुले युद्ध की सीमा रेखा को पार किए बिना रणनीतिक बढ़त हासिल करना - वैसा ही आचरण अब पाकिस्तान भी अपना रहा है।

अमेरिका के प्रतिष्ठित थिंक-टैंक 'रेंड कॉरपोरेशन' की एक रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इस तरह के जानबूझकर बनाए गए कानूनी और सामरिक असमंजस को अब समाप्त किया जाना चाहिए। जब प्रबलित पतवार वाले जहाजों से टक्कर मारी जाती है या उच्च दबाव वाली वाटर कैनन का इस्तेमाल किया जाता है, तो इससे होने वाला नुकसान किसी मिसाइल या टॉरपीडो हमले जैसा ही गंभीर होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, "समुद्र में ऐसी टक्करों और वाटर कैनन के हमलों को मामूली घटना नहीं माना जा सकता; जब इनसे पारंपरिक युद्धक हमलों जैसा नुकसान हो, तो यह आत्मरक्षा में आनुपातिक प्रतिक्रिया की मांग करता है।"

अंतरराष्ट्रीय कानून व भारत-पाक समझौते की अनदेखी

अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में एक भारतीय नौसैनिक जहाज और एक पाकिस्तानी नौसैनिक पोत के बीच हुई ताजा टक्कर ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान का यह आचरण 1991 के उस द्विपक्षीय समझौते के अनुच्छेद 10 का सीधा उल्लंघन है, जो सैन्य अभ्यासों और गतिविधियों की अग्रिम सूचना देने के लिए बनाया गया था।

यह घटना 1999 के ऐतिहासिक लाहौर घोषणापत्र के उस अधूरे वादे की भी याद दिलाती है, जिसमें दोनों देशों की नौसेनाओं और वायु सेनाओं के बीच किसी भी तरह की दुर्घटना या खतरनाक मुठभेड़ को रोकने के लिए एक विशेष समझौते पर चर्चा होनी थी।

हालांकि, परमाणु-सक्षम दोनों पड़ोसियों के बीच विश्वास बहाली के कई प्रयास हुए, लेकिन समुद्री घटनाओं को रोकने से जुड़ा वह प्रस्तावित समझौता कभी मूर्त रूप नहीं ले सका, और इसके कुछ ही महीनों बाद दोनों देशों को कारगिल की पहाड़ियों पर युद्ध के मैदान में आमने-सामने आना पड़ा।