नई दिल्ली (जागरण संवाददाता)। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दैनिक जागरण की खबर पर संज्ञान लेते हुए सोमवार को केंद्र सरकार और एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) को नोटिस जारी कर पूछा है कि आखिर सीआरपीएफ जवान मनोज तोमर को इलाज के लिए चार साल तक क्यों भटकना पड़ा। सचिव, केंद्रीय गृह मंत्रालय और निदेशक, एम्स नई दिल्ली को चार सप्ताह के भीतर जवाब देने को कहा गया है।

बता दें कि मार्च 2014 में छत्तीसगढ़ में नक्सलियों से लड़ते हुए शरीर पर सात गोलियां झेलने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के जवान मनोज तोमर को अब तक समुचित इलाज उपलब्ध नहीं हो सका है। जान तो बच गई, लेकिन न तो पेट से बाहर लटकी आंते अंदर रखी जा सकीं हैं और ना ही एक आंख की रोशनी लौटाई जा सकी। दैनिक जागरण और सहयोगी प्रकाशन नई दुनिया में खबर के प्रकाशन के बाद अब जाकर मध्यप्रदेश सरकार ने जहां जवान को दस लाख रुपये की सहायता की अनुशंसा की है, वहीं सीआरपीएफ ने भी उसे हरसंभव इलाज का आश्वासन दिया है।

नियम पर उठा सवाल

आखिर सीआरपीएफ जवान मनोज तोमर को चार साल तक पीड़ा क्यों झेलनी पड़ी। उसे समुचित इलाज मुहैया क्यों नहीं हो सका। इस बात की पड़ताल करने पर चौंकाने वाला सच सामने आया। पीड़ित जवान और सीआरपीएफ ने बताया कि इसमें दरअसल एक नियम आड़े आता रहा। नियम के अनुसार सीआरपीएफ जवान जिस राज्य में तैनाती के दौरान घायल होते हैं, उसी राज्य में मौजूद सीआरपीएफ से अनुबंधित अस्पतालों में ही उन्हें इलाज मुहैया कराया जाता है। सत्येंद्र सिंह, पीआरओ, सीआरपीएफ मुख्यालय, नई दिल्ली ने दैनिक जागरण को बताया कि शहीद होने पर राज्य सरकार जवान के परिजन को अपने हिसाब से सहायता देती है। जहां तक घायल जवानों का प्रश्न है तो उन्हें विकलांगता के प्रतिशत के आधार पर मदद दी जाती है। उपचार सीआरपीएफ के लिए संबंधित राज्य के अनुबंधित अस्पताल में ही किया जाता है।

अतार्किक है नियम

मनोज के मामले में साबित हुआ कि यह नियम बेहद अतार्किक है। रायपुर, छत्तीसगढ़ स्थित सीआरपीएफ से अनुबंधित रामकृष्ण ट्रस्ट और नारायणा अस्पताल में मनोज का इलाज हुआ, जहां उन्हें समुचित इलाज नहीं मिल सका। मनोज ने बताया कि तीन बार उनके पेट का ऑपरेशन फेल हुआ। बाहर लटकी आंत को वापस पेट के अंदर नहीं रखा जा सका। आंख का भी ऑपरेशन नहीं हो सका। समुचित समाधान के लिए एम्स या अन्यत्र किसी बड़े अस्पताल में इलाज की दरकार थी, लेकिन उक्त नियम आड़े आया। लिहाजा जवान को उसके हाल पर छोड़ दिया गया। एक-दो नहीं पूरे चार साल से वह आंतों को पॉलीथिन में लपेटे इलाज की राह तकता रहा।

संशोधन की दरकार

जानकारों का कहना है कि सीआरपीएफ के जवानों के लिए जो देश की रक्षा को हर पल मौत का सामना करने को तत्पर रहते हैं, नियम तो यह होना चाहिये कि देश का कोई भी बड़े से बड़ा सरकारी अथवा प्राइवेट अस्पताल घायल जवान की प्राणरक्षा के लिए न केवल हमेशा उपलब्ध कराया जाएगा, बल्कि वह अस्पताल भी जवान के इलाज को प्राथमिकता देगा। मसलन, एम्स की प्रतीक्षासूची भी इसके आड़े नहीं आएगी। आवश्यक हो तो विदेश भी क्यों नहीं ले जाया जाना चाहिये।

सीआरपीएफ ने दिया बेहतर इलाज का आश्वासन

सीआरपीएफ ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर ट्वीट कर बताया कि 'महानिदेशक, सीआरपीएफ द्वारा पीड़ित जवान को हरसंभव इलाज मुहैया कराने के लिए दिशानिर्देश जारी कर दिए गए हैं। उनके बेहतर इलाज के लिए जो भी जरूरी होगा, उपाय किए जाएंगे। शहीदों के परिजनों की देखभाल और घायल जवानों की पूरी देखरेख करने को लेकर हम कटिबद्ध हैं।' महानिदेशक के निर्देश पर डीआइजी, सीआरपीएफ (ग्वालियर) जवान के ग्वालियर स्थित घर पहुंचे और उन्हें इससे अवगत कराया गया।

गाजियाबाद के निजी अस्पताल ने की निशुल्क उपचार की पेशकश

देश के कई हिस्सों से जवान मनोज तोमर की मदद के लिए लोग आगे आए हैं। कौशांबी, गाजियाबाद के यशोदा सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के संचालक डॉ. पीएन अरोरा ने जवान मनोज का पूरा उपचार निशुल्क करने की पेशकश की।

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