नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। मुस्लिम महिलाओं को मस्जिदों में प्रवेश और नमाज पढ़ने की इजाजत मांगने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार व अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। इसके साथ ही कोर्ट ने याचिका में पक्षकार बनाए गए उन कुछ पक्षकारों को फिर से नोटिस भेजने के आदेश दिये हैं जिन्हें अभी तक कोर्ट का नोटिस सर्व नहीं हुआ था। कोर्ट मामले पर पांच नवंबर को फिर सुनवाई करेगा।

ये आदेश मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोबडे और एस अब्दुल नजीर की पीठ ने पुणे निवासी दंपति यासमीन जुबेर अहम पीरजादा और जुबैर अहमद नजीर अहमद पीरजादा की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिये। याचिका में सभी मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश और नमाज पढ़ने की इजाजत मांगी गई है। कोर्ट ने इस मामले में पहली बार गत 16 अप्रैल को नोटिस जारी किया था। शुक्रवार को जब मामला दोबारा सुनवाई पर आया तो याचिकाकर्ता के वकील आशुतोष दुबे ने कोर्ट को बताया कि कुछ पक्षकारों को अभी तक नोटिस सर्व नहीं हुआ है। कोर्ट ने तीन पक्षकारों आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड, सेंट्रल वक्फ काउंसिल और महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड आफ वक्फ को नये सिरे से नोटिस जारी करते हुए विशेष संदेशवाहक के जरिए तत्काल नोटिस सर्व करने का आदेश दिया। हालांकि नोटिस सर्व होने के बावजूद सरकार की ओर से अभी तक याचिका का जवाब दाखिल नहीं किया गया है वैसे सरकार की ओर से वकील मौजूद थे। कोर्ट ने सभी पक्षों से याचिका पर जवाब मांगा है।

कोर्ट ने 16 अप्रैल को केन्द्र सरकार के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, कानून मंत्रालय, अल्पसंख्यक मामले मंत्रालय, राष्ट्रीय महिला आयोग, महाराष्ट्र स्टेट बोर्ड आफ वक्फ, सेन्ट्रल वक्फ काउंसिल और आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड को नोटिस जारी किया था। इनमें से अंत के तीन पक्षों को अभी तक नोटिस सर्विस नहीं हुआ है, जिन्हें शुक्रवार को नये सिरे से नोटिस जारी किया गया। याचिका में सुप्रीम कोर्ट के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक और भेदभाव वाला बताए जाने के आदेश को आधार बनाते हुए कहा गया है कि मस्जिद में महिलाओं के प्रवेश पर रोक मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। कुरान और हदीस में लिंग आधारित भेदभाव नहीं किया गया है। पाबंदी को असंवैधानिक घोषित किया जाए।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि उसने पत्र लिखकर 19 अक्टूबर 2018 को पुणे के बोपोडी में मोहम्मदिया जामा मस्जिद में नामाज पढ़ने की इजाजत मांगी थी, जिसके जवाब में जामा मस्जिद ने कहा कि पुणे और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का चलन नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि इस बारे में दाउद ख्वाजा और दारुल उलूम देवबंद को लिखा गया है। जब याचिकाकर्ता को जवाब नहीं मिला तो उसने 26 नवंबर 2018 को फिर पत्र लिख कर मांग याद दिलाई। जिस पर जामा मस्जिद के इमाम ने जवाब दिया कि महिलाओं को मस्जिद मे प्रवेश की इजाजत नहीं दी जा सकती उन्होंने कुछ अस्पष्ट से कारण भी बताए और कहा कि इस बारे में निर्देश के लिए उच्च अथारिटी को लिखा है। याचिकाकर्ता ने कहा है कि उसने सुप्रीम कोर्ट में याचिका इसलिए दाखिल की है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ही उसके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए उचित आदेश दे सकता है। मांग है कि कोर्ट आदेश दे कि मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में प्रवेश दिया जाए। उन्हें मस्जिद के मुख्य द्वार से अंदर जाने की इजाजत मिले। महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश पर रोक का फतवा रद किया जाए।

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Posted By: Tilak Raj

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