मुंबई [ओमप्रकाश तिवारी]। हर साल की तरह इस बार भी मुंबई मानसून के पहले चरण में ही पानी-पानी होती दिखाई दे रही है। कई जगह जलभराव की स्थिति है। लोकल ट्रेनों और बसों की आवाजाही थम सी गई है। स्कूल-कॉलेज बंद करने की नौबत आ गई है। और दो दर्जन से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। अगले 48 घंटे भी यहां पर मौसम खराब रहने के संकेत मिले है। विभाग ने सलाह दी है कि यदि घर से बाहर निकल रहे हैं तो मौसम के बारे में पहले से पता कर लें कहीं ऐसा ना हो घर से निकलने के कुछ देर बाद ही बारिश में फंस जाएं।  

हर साल क्यों भर जाता है पानी?

पुर्तगालियों और अंग्रेजों के बसाए गए शहर की ऐसी दुर्दशा हर साल क्यों होने लगती है ? भारत के कई राज्यों, अथवा कुछ छोटे-मोटे देशों से ज्यादा बजट रखने वाली मुंबई महानगरपालिका हर साल करोड़ों रुपए खर्च करके भी इसका कोई स्थायी उपाय क्यों नहीं ढूंढ पाती? जबकि पिछले 25 वर्षों से मुंबई महानगरपालिका पर एक ही पार्टी, अर्थात मुंबई के नाम पर जीने-मरने को तैयार शिवसेना की सत्ता रही है। 26 जुलाई, 2005 को मुंबई में आई ऐसी ही बाढ़ में करीब 1100 लोग मारे गए थे और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हो गया था।

दो साल पहले ऐसी ही एक बरसात के दौरान परेल इलाके में पैदल चलकर अपने घर की ओर जा रहे बॉम्बे हॉस्पिटल के एक डॉक्टर की मेनहोल में गिरकर मृत्यु हो गई थी। कुछ दिनों बाद उनका शव करीब सात किलोमीटर दूर वरली के समुद्र में पाया गया था। इन सबके बावजूद अभी तक पालिका ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर पाई है कि मुंबई की सड़कों पर पानी न भरे और सब कुछ यहां से सामान्य तरह से निकल जाए।

हाई टाइड से सिहर जा रहे लोग

मुंबई में हमेशा आने वाली इस बाढ़ के दौरान अक्सर एक शब्द – ‘हाई टाइड’ सुना जाता है। ये शब्द लोगों का डर और बढ़ा देता है। इस हाई टाइड को ही हिंदी में ‘ज्वार’ कहते हैं। 24 घंटे के अंदर समुद्र का जलस्तर दो बार अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचता है और दो बार सबसे निचले स्तर पर। ये स्थितियां छह-छह घंटे के बाद आती हैं। इसके साथ ही, भूमंडल की गति के अनुसार हर साल किसी एक दिन समुद्री ज्वार अपने सबसे ऊंचे स्तर पर होता है। इस विशेष दिन से पहले और बाद के तीन-तीन दिन भी ज्वार का स्तर चढ़ते और उतरते क्रमानुसार ऊंचा ही होता है।

इन दिनों में ज्वार के समय समुद्र में जलस्तर तो ऊंचा होता ही है, 12-14 फुट ऊंची लहरें भी उठती हैं। यदि ज्वार की इस अवधि से ठीक पहले दो-तीन घंटे तेज बरसात हो जाए तो मुंबई महानगर से समुद्र की ओर जाने वाला बरसाती पानी समुद्र आत्मसात नहीं कर पाता। इस दौरान समुद्र का जलस्तर एवं मुंबई के सीवरों का जलस्तर लगभग बराबर हो जाता है। मुंबई में अधिकतम ज्वार वाले सप्ताह में यह स्थिति होटल ताज के सामने खड़े होकर देखी जा सकती है, जहां समुद्र का जलस्तर होटल ताज के सामने बनी सड़क के लगभग बराबर नजर आता है। लेकिन जैसे ही ज्वार के बाद भाटा यानी लो-टाइड शुरू होता है, सीवर के रास्ते पानी फिर समुद्र में जाने लगता है और शहर का जलभराव खत्म हो जाता है।

मानव निर्मित है कारण

मुंबई में जलभराव का दूसरा कारण मानव निर्मित है। आज की मुंबई कभी समुद्र के अंदर बसे सात द्वीपों का समूह हुआ करती थी। पहले पुर्तगालियों ने, तो बाद में अंग्रेजों ने, और उसके बाद आजाद भारत के शासनकर्ताओं ने इन सातों द्वीपों के बीच की समुद्री खाड़ियों को पाटकर इसे तीन तरफ समुद्र से घिरे एक भूखंड का रूप दे दिया। मुंबई के पश्चिमी छोर पर जहां लहराता अथाह अरब सागर नजर आता है, वहीं पूर्वी छोर पर ठाणे-नई मुंबई-शिवड़ी आदि बस्तियों के घेरे बड़ी-बड़ी समुद्री खाड़ियां नजर आती हैं।

बांद्रा रिक्लेमेशन, बैकबे रिक्लेमेशन और नरीमन प्वाइंट जैसे कई स्थान तो बाकायदा समुद्र को पाटकर ही बसाए गए हैं। इस प्रकार समुद्र को पीछे ढकेलते हुए कभी नहीं सोचा गया कि इसके दुष्परिणाम क्या होंगे। यहां तक कि पक्की सड़कें बनाते समय उसके दोनों ओर बनाए गए फुटपाथ भी कच्चे नहीं छोड़े गए। यानी धरती में पानी सोखने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। कभी मुंबई में 22 पहाड़ियां हुआ करती थीं। इनमें से ज्यादातर को काट-तोड़कर वहां बस्तियां बसा दी गई हैं। इन बेतरतीब बस्तियों को बसाते समय जलनिकासी का कोई ध्यान नहीं रखा गया। आबादी लगातार बढ़ती गई है। यही कारण है कि आज जब तेज बरसात होती है, समुद्र शहर का पानी शहर को लौटाने लगता है तो मुंबई पानी-पानी होती नजर आने लगती है।

क्या है पानी भर जाने के बड़े कारण

- शासनकर्ताओं ने इन सातों द्वीपों के बीच की समुद्री खाड़ियों को पाटकर इसे तीन तरफ समुद्र से घिरे एक भूखंड का रूप दे दिया

- बांद्रा रिक्लेमेशन, बैकबे रिक्लेमेशन और नरीमन प्वाइंट जैसे कई स्थान तो बाकायदा समुद्र को पाटकर ही बसाए गए

- पक्की सड़कें बनाते समय उसके दोनों ओर बनाए गए फुटपाथ भी कच्चे नहीं छोड़े गए।

- धरती में पानी सोखने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए।

- मुंबई में 22 पहाड़ियां हुआ करती थीं। इनमें से ज्यादातर को काट-तोड़कर वहां बस्तियां बसा दी गई

- बेतरतीब बस्तियों को बसाते समय जलनिकासी का कोई ध्यान नहीं रखा गया।

- हाई टाइड की वजह से शहर का पानी नहीं जा पाता समुद्र में।

- जब समुद्र में लो-टाइड शुरू होता है तो सीवर के रास्ते पानी फिर समुद्र में जाने लगता है और शहर का जलभराव खत्म हो जाता है।

 

Posted By: Vinay Tiwari

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