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'CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग की कोशिश बेकार', मुकुल रोहतगी ने विपक्ष के आरोपों को बताया बेबुनियाद

Published: Sat, 26 Sep 2026 06:35 PM (IST)

पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष की महाभियोग की प्रस्तावित कोशिश को असंवैधानिक और आधारहीन बताया है।

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HighLights

  1. महाभियोग की कोशिश का कोई संवैधानिक आधार नहीं: रोहतगी।

  2. चुनाव आयोग में असहमति लोकतांत्रिक फैसले का अच्छा संकेत है।

  3. आंतरिक नोट हटाने की कार्रवाई का आधार नहीं बन सकते।

डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार (Gyanesh Kumar) के खिलाफ महाभियोग (Impeachment) चलाने की विपक्ष की प्रस्तावित कोशिश का कोई संवैधानिक अधार नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के भीतर असहमति असल में लोकतांत्रिक तरीके से फैसले लेने का एक अच्छा संकेत है।

NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, रोहतगी में कहा कि इसका साफ जवाब नहीं है। ऐसे आरोपों पर महाभियोग का प्रस्ताव नहीं लाया जा सकता जो पूरी तरह अस्पष्ट हों और जिनमें कोई ठोस तथ्य या कारण न हों।

विपक्ष ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए एक नया नोटिस तैयार कर रहा है। यह कदम 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट के बाद उठाया जा रहा है जिसमें कहा गया था कि दो चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने CEC को 14 प्रशासनिक नोट भेजे थे और कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर प्रतिक्रियों और फैसलों पर आपत्ति जताई थी।

आंतरिक नोट को हटाने की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता- रोहतगी

उस खबर का जिक्र करते हुए रोहतगी ने कहा कि ऐसे नोट आंतरिक होते हैं और उन्हें हटाने की कार्रवाई का आधार नहीं बनाया जा सकता क्योंकि आयोग बहुमत से फैसला करता है। उन्होंने तर्क दिया कि आखिरकार, अगर EC सर्वसम्मति से कोई आदेश जारी करता है, तो इसका मतलब है कि अलग-अलग राय या असहमति को सुलझा लिया गया है और तालमेल बिठा लिया गया है।

उन्होंने कहा कि CEC की बात बाकी दो सदस्यों से ज्यादा अहम नहीं होती। CEC सिर्फ तीनों में से एक है। CEC का वोट बाकी दो के बराबर ही होता है। रोहतगी ने दो चुनाव आयुक्तों द्वारा कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्र पर भी बात की, जिसमें कथित तौर पर कुछ काम सौंपने को लेकर आंतरिक असहमति जताई गई थी।

चुनाव आयुक्तों की अपनी संवैधानिक स्थिति को लेकर गलतफहमी- रोहतगी

उन्होंने कहा कि यह चुनाव आयुक्तों की अपनी संवैधानिक स्थिति को लेकर गलतफहमी है। वे एक संवैधानिक संस्था हैं। कैबिनेट सचिव एग्जीक्यूटिव और ब्यूरोक्रेसी के प्रमुख होते हैं। इसमें उनकी क्या भूमिका हो सकती है? यह पूरी तरह गलत है।

उन्होंने सवाल उठाया कि ये नोट सार्वजनिक कैसे हुए, भगवान ही जाने किसने लीक किया। भगवान ही जाने यह कितना सही है। भगवान जाने उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी को क्यों लिखा।

चुनाव आयोग की तुलना सुप्रीम कोर्ट की कई जजों वाली बेंच से करते हुए रोहतगी ने कहा कि सुनवाई को दौरान जज अक्सर असहम होते हैं, लेकिन सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हैं। आपको अंतिम आधिकारिक नतीजे को ही मानना होता होगा।

उन्होंने कहा कि कई ऐसे मामले हैं जिनमें चीफ जस्टिस अल्पमत में होते हैं और दूसरे जज चीफ जस्टिस के फैसले को पलट देते हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि चीफ जस्टिस ने कोई गलत काम किया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि महाभियोग का कोई आधार नहीं था।

उन्होंने कहा कि कभी-कभी अल्पमत वाली राय बाद में सही साबित होती है। अससहमति और अलग-अलग राय लोकतंत्र की नींव हैं। यह स्वतंत्र लोकतंत्र है। उन्होंने इस विवाद को राई का पहाड़ बनाने जैसा बताया।

क्या है CEC को हटाने की प्रक्रिया?

रोहतगी ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, CEC को केवल उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो सुप्रीम कोर्ट के जज पर लागू होते हैं। इसके लिए संसद के दोनों सदनों द्वारा कुल सदस्यों के बहुमत और उपस्थित तथा वोट देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करना जरूरी है। यह प्रस्ताव साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर लाया जाता है।

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