नई दिल्ली। रेल मंत्री मुकुल राय भी अपनी नेता और पूर्व रेल मंत्री ममता बनर्जी की तरह दफ्तर नहीं आते। यह रेल मंत्रालय की चिंता का कारण है क्योंकि इसके कारण कई महत्वपूर्ण निर्णय लटक जाते हैं। मंत्री के अनुमोदन के लिए महत्वपूर्ण फाइलें कोलकाता भेजी जाती हैं। इसका असर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी रेल व्यवस्था की सुरक्षा पर पड़ रहा है।

कार्यालय से राय की अनुपस्थिति को लेकर रेल मंत्रालय की संचालन व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। इस मंत्रालय पर 2.2 करोड़ यात्रियों को प्रतिदिन 11 हजार ट्रेनों के जरिए उनकी मंजिल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है। पिछले तीन मंत्री ममता बनर्जी, दिनेश त्रिवेदी और मुकुल राय तृणमूल काग्रेस के ही रहे हैं। रेलवे बोर्ड के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा कि मंत्री के दफ्तर न आने का गलत संकेत जाता है। इसका रेलवे के पूरे नेटवर्क पर प्रभाव पड़ता है।

यही बात बोर्ड के कई पूर्व अधिकारियों ने भी कही है। उनका कहना है कि रेलवे देश की जीवन रेखा है और इसे रिमोट कंट्रोल से नहीं चलाया जा सकता। इसके लिए महत्वपूर्ण आर्थिक मंत्रालयों, गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय में नजदीकी समन्वय की जरूरत है। गत 20 मार्च को रेल मंत्रालय का प्रभार ग्रहण करने के बाद से राय भी ममता की तरह ही अधिकाश समय कोलकाता में पार्टी का काम करते बिताते हैं।

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