मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। यातायात नियमों के उल्लंघन के लिए बड़े पेनाल्टी से परेशान राज्यों सरकारों के रुख को देखते हुए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने स्थिति स्पष्ट की कि राज्यों को अपने जुर्माने तय करने का अधिकार है। हालांकि अब तक मंत्रालय के अधिकारियों का कहना था कि राज्यों को जुर्माने बढ़ाने का अधिकार तो है घटाने का नहीं है।

बुधवार को गडकरी ने चूंकि मोटर वाहन कानून समवर्ती सूची में आता है, लिहाजा केंद्र व राज्य सरकारों को नियमों में संशोधन के साथ ही नए नियम बनाने का अधिकार है।

बुधवार को कहा गया कि मुख्य एक्ट की धारा 200 में राज्यों को कंपाउंडिंग वाले अपेक्षाकृत कम गंभीर उल्लंघनों में बदलाव का अधिकार है।

कंपाउंडिंग के तहत बिना पास या टिकट के यात्रा, अधिकारी के मांगने पर कागजात न दिखाना, अनधिकृत व्यक्ति का वाहन चलाने की अनुमति देना, अनफिट वाहन चलाना, लाइसेंस निलंबन के बाद भी गाड़ी चलाना, खतरनाक ढंग से गाड़ी चलाना, शारीरिक रूप से अनफिट होने पर भी गाड़ी चलाना, रेसिंग, असुरक्षित वाहन चलाना, वाहन में फेरबदल कर बेचना, रजिस्ट्रेशन के बगैर वाहन चलाना, ओवरलोड वाहन चलाना, बिना बीमा के वाहन चलाना तथा बिना अधिकार के वाहन चलाना शामिल है। जबकि रेड लाइट क्रास करना, शराब पीकर गाड़ी चलाना जैसे अपराध नान कंपाउंडिंग की श्रेणी में आएंगे। नियम के तहत उसमें बदलाव नहीं किया जा सकता है।

एक्ट को हड़बड़ी में पास कराया गया

इंडियन फाउंडेशन आफ ट्रांसपोर्ट रिसर्च एंड ट्रेनिंग के एसपी सिंह ने कहा कि मोटर एक्ट को जिस हड़बड़ी में पास कराया गया उसके बाद ये स्थिति पैदा होनी ही थी। जिस तरह एक्ट में जुर्मानों को समस्त यातायात समस्याओं के साथ दुर्घटना उन्मूलन का समाधान माना गया है वो अपने आपमें भ्रामक है।

जुर्माने बढ़ाने से शुरू में तो डर के कारण सुधार दिखता है, लेकिन धीरे-धीरे चीजें फिर पुराने ढर्रे पर चलने लगती हैं। 1988 में जब जुर्माने बढ़ाए गए थे तब भी कुछ समय के लिए दुर्घटनाएं कम हुई थीं। लेकिन बाद में सब जस का तस हो गया। जब तक उल्लघनकर्ताओं के लाइसेंस, परमिट और वाहन निलंबित और जब्त करने पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक असली सुधार संभव नहीं है।

 

Posted By: Nitin Arora

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