नई दिल्ली, जेएनएन। आज के भौतिकवादी दौर में हर तरफ प्रतिस्पर्धा है। ऐसे में समय और हालात किसी के लिए भी अच्छे और ख़राब हो सकते हैं, लेकिन यह आप पर निर्भर करता है कि आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। समस्‍या के बाद भी कितने आत्‍मविश्‍वासी दिखते हैं। कहते हैं सफलता के कई पैरेंट्स होते हैं और असफलता अनाथ होती है। लेकिन यह सही नहीं है। मुझे पूर्व राष्ट्रपति डा. एपीजे अब्‍दुल कलाम से जुड़ा एक वाकया बहुत याद आता है जो कि हमें सही राह भी दिखाता है।

जब वह प्रोजेक्ट डायरेक्टर के तौर पर एसएलवी 3 का प्रक्षेपण करने के लिए सात वर्षों से अथक प्रयास कर रहे थे और अंततः 1979 में वह घडी भी आ गई, जब इस उपग्रह का प्रक्षेपण होना था। यह हमारा अंतरिक्ष में पहला प्रयास था, जब प्रक्रिया शुरू हुई तो पहले चरण में सब कुछ ठीक था। सब सांस रोकर इसको देख रहे थे। तभी दूसरे चरण में उपग्रह नियंत्रण से बाहर हो गया। 317 सेकंड के बाद पूरा ढांचा समुंद्र में गिर गया। पूरी टीम पर जैसे पहाड़ ही टूट पड़ा। ये पल सबके लिए सदमे से कम नहीं थे। उस दिन एक प्रेस कान्फ्रेंस का आयोजन किया गया था।

संगठन के अध्यक्ष प्रोफेसर सतीश धवन ने स्‍वयं पत्रकारों के सभी प्रश्‍नों के उत्तर पूरे आत्मविश्वास के साथ दिए और कहा कि ये अभियान बहुत जटिल होते हैं और हम इसकी पूरी जांच करेंगे और पता लगाएंगे कि क्या कमी रह गई और आने वाले एक वर्ष के अंदर हम पुन: इसका सफलतापूर्वक प्रक्षेपण करेंगे। उनकी बातों ने टीम के अंदर एक नया आत्मविश्‍वास भर दिया। 18 जुलाई, 1980 को प्रक्षेपण की घड़ी आ गई और इस बार हम सफल हुए। यह भारत का अंतरिक्ष में पहला कदम था। इस कामयाबी से भारत अंतरिक्ष में उपस्थित विश्‍व के थोड़े से देशों में शामिल हो गया था। इस बार भी प्रेस कान्फ्रेंस का आयोजन था और प्रोफेसर धवन ने इस बार माइक मेरे आगे कर दिया और मुझे सारे जवाब देने दिए। उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुझे लीडरशिप का सबसे बड़ा सबक सीखने को मिला।

किसी भी फील्‍ड में एक सच्‍चा लीडर हमेशा असफलता का दोष अपने ऊपर ले लेता है और सफलता का श्रेय अपनी टीम को देता है। क्‍योंकि आप एक कामयाब या इफेक्टिव लीडर तभी होंगे, जब आपकी टीम भी उतनी ही कामयाब होगी। इसलिए अपनी टीम को हमेशा प्रोत्साहित करें। सबको और अच्छा काम करने के लिए प्रेरित करें।

डा अनिल सेठी

(मोटिवेटर एवं लाइफ कोच)