नई दिल्ली, अनुराग मिश्र

बेंगलुरु में सितंबर में रिकॉर्ड बारिश

इस साल अगस्त में बेंगलुरु में 370 मिमी बारिश हुई, जो अगस्त 1998 में 387.1 मिमी बारिश के अब तक के रिकॉर्ड से थोड़ी ही कम है। शहर के कुछ इलाकों में 1 से 5 सितंबर के दौरान सामान्य से 150 प्रतिशत ज्यादा बारिश हुई है। महादेवपुरा, बोम्मनहल्ली और केआर पुरम में तो सामान्य से 307 प्रतिशत ज्यादा बारिश देखी गई। दशक के हिसाब से देखें तो 1901-10 के बाद 2011-2020 के दशक में सबसे ज्यादा औसत बारिश हुई है। 1921-30 के बाद सबसे तेज बारिश भी 2011-2020 के दशक में ही हुई।

दिल्ली में मानसून की विदाई में देर

राजधानी में कुछ सालों पहले तक मानसून की विदाई सितंबर मध्य में होने लगती थी। पिछले साल 17 सितंबर को इसकी विदाई हुई, लेकिन इस वर्ष 23, 24 और 25 सितंबर को हुई मूसलाधार बारिश ने कई रिकॉर्ड तोड़ दिए। राजधानी में एक हफ्ते में सामान्य से 9 गुना तक बारिश हुई।

अंबाला में टूटा 77 वर्षों का रिकॉर्ड

मौसम विभाग चंडीगढ़ के अनुसार अम्बाला में 25 सितंबर को 24 घंटे में 107.2 मिमी बारिश रिकॉर्ड की गई। इससे पहले 26 सितंबर 1945 को 24 घंटे में 224.8 मिमी बारिश हुई थी। उसके बाद 77 वर्षों में कभी 24 घंटे में इतनी बारिश नहीं हुई।

बीते कुछ सालों से सितंबर में अधिक बारिश का सिलसिला बढ़ा है। हाल के एक अध्ययन में आर्कटिक महासागर में समुद्री बर्फ पिघलने को इसकी वजह बताया गया है। अल-नीनो और ला-नीना जैसी घटनाएं भी सितंबर में बारिश बढ़ा रही हैं। मौसम विभाग के मुताबिक, वर्तमान में इक्वेटोरियल पैसिफिक रीजन में ला नीना की स्थिति बनी हुई है। अनुमान है कि ऐसे हालात साल के अंत तक रहेंगे। यानी इस साल सर्दियों में भी बारिश होने की पूरी संभावना है।

स्काईमेट के महेश पलावत ने जागरण प्राइम को बताया, पिछले कुछ सालों के दौरान देखने में आया है कि मानसून की विदाई अक्टूबर तक होती है। पिछले साल भी मानसून अक्टूबर में विदा हुआ और इस साल भी आसार ऐसे ही बने हुए हैं। पिछले साल सितंबर में 400 मिमी से अधिक बारिश हुई थी।

पुणे स्थित मौसम विज्ञान विभाग के अध्ययन के अनुसार भारत में सितंबर में बारिश की चरम घटनाओं की वजह आर्कटिक के कारा सागर क्षेत्र में मौसमी परिवर्तनों का होना है। गर्मियों के दौरान कारा सागर क्षेत्र में समुद्री बर्फ के तेजी से पिघलने से समुद्र का आवरण (कम समुद्री बर्फ) खुल जाता है। गर्मी के समय में यह बदलाव बारिश की परिस्थितियों को अनुकूल बना देता है। इससे वायुमंडलीय सर्कुलेशन बदल जाता है। इसका प्रभाव भारतीय भूभाग पर प्रभाव पड़ता है। अरब सागर के तापमान के साथ-साथ ऊपरी वायुमंडलीय सर्कुलेशन में बदलाव अरब सागर के ऊपर पश्चिमी मानसूनी हवाओं द्वारा नमी में बढ़ोतरी करते हैं। इससे मध्य और पश्चिम भारत में अधिक बारिश की घटनाएं हो सकती हैं।

इसलिए अधिक हो रही सितंबर में बारिश

सितंबर में अधिक बारिश का पहला कारण पैसिफिक ओसन के ऊपर बना अल नीनो का इफेक्ट है, जिसने मानसून को दबाया और जुलाई में कम बारिश हुई। दूसरा, वर्तमान में समुद्री सतह का तापमान और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की हवाएं अल नीनो का संकेत दे रही हैं। हालांकि मानसून के आखिरी चरण अथवा उसके बाद ला नीना की स्थिति फिर से उभरने की संभावना है। तीसरा कारण बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाब का क्षेत्र है। इसके लगातार बनने से लंबे वक्त तक भारी बारिश होती है।

बदल रहा है बारिश का पैटर्न

केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान सचिव एम. रविचंद्रन ने कहा, अल नीनो और ला नीना मानसूनी बारिश को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। सितंबर में मौसम मुख्य रूप से ध्रुवीय क्षेत्र से प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि न केवल स्थानिक, बल्कि अंतर-मौसमी कारक भी बारिश का पैटर्न बदल रहे हैं।

जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

भारत मौसम विज्ञान विभाग के महानिदेशक, मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि अगर हम दशकीय परिवर्तन को देखें, तो पूरे देश के लिए कोई दीर्घकालिक परिवर्तन नहीं है, लेकिन अस्थायी परिवर्तनशीलता बनी हुई है। मौसम कभी बहुत शुष्क होता और कभी बहुत गीला। हालांकि कुल बारिश समान रहती है। भारी बारिश के दिनों की संख्या बढ़ रही है और हल्की से मध्यम बारिश के दिन घट रहे हैं, इसलिए कहा जा सकता है कि यह जलवायु परिवर्तन का प्रभाव है।

मौसम वैज्ञानिक समरजीत चौधरी का कहना है कि सितंबर में औसतन 129 मिलीमीटर बारिश दर्ज की जाती है। लेकिन इस साल अब तक 146.4 मिलीमीटर से ज्यादा बारिश हो चुकी है। पिछले साल सितंबर में 302.8 मिलीमीटर तक बारिश दर्ज की गई थी। दरअसल बंगाल की खाड़ी में बने कम दबाव के क्षेत्र, अरब सागर से काफी मात्रा में आ रही नमी और एक पश्चिमी विक्षोभ के कम दबाव के क्षेत्र के संपर्क में आने से ये बारिश हुई।

हिमालय की तलहटी में बढ़ी भारी बारिश की घटनाएं

वैज्ञानिकों ने पाया है कि ब्लैक कार्बन और धूल जैसे एरोसोल्स के कारण हिमालय क्षेत्र की तलहटी में भारी वर्षा की घटनाओं में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरेकेला, लीपज़िग इंस्टीट्यूट फॉर मीटीरोलॉजी (लिम), यूनिवर्सिटी ऑफ लीपजिंग, जर्मनी, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के अनुसंधानकर्ताओं की एक टीम के अध्ययन में यह बात सामने आई है। उन्होंने दिखाया कि पार्टिकुलेट एमिशन या कण उत्सर्जन, क्लाउड सिस्टम के भौतिक और गतिशील गुणों को बदल सकता है। इसके फलस्वरूप प्रदूषित शहरी क्षेत्रों में हवा के साथ वर्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी होती है।

अध्ययन में क्या आया सामने

हिमालय की तलहटी में अधिक बारिश होने की जांच करने के लिए किए गए अध्ययन में 17 वर्षों (2001-2017) की बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसके साथ ही एरोसोल माप का भी आकलन किया गया। वहीं, थर्मोडायनामिक वेरिएबल्‍स और लांग वेब रेडिएशन की गणना से भारी वर्षा का गणित समझने में मदद मिली। टीम को भारी बारिश की घटनाओं, उच्च एरोसोल लोडिंग और स्थैतिक ऊर्जा (एमएसई) बीच स्पष्ट जुड़ाव मिला। इससे यह स्पष्ट हुआ कि हिमालय क्षेत्र में उच्च वर्षा की घटनाओं पर एरोसोल के विकिरण प्रभाव का महत्वपूर्ण असर होता है।

क्या हैं एरोसोल

सूक्ष्म ठोस कणों अथवा तरल बूंदों के हवा या किसी अन्य गैस में समाहित होने को एरोसोल कहा जाता है। एरोसोल प्राकृतिक या मानव जनित हो सकते हैं। हवा में उपस्थित एरोसोल को वायुमंडलीय एरोसोल कहा जाता है। धुंध, धूल, वायुमंडलीय प्रदूषक कण तथा धुआं एरोसोल के उदाहरण हैं। तरल या ठोस कणों का व्यास 1 माइक्रोन या उससे भी छोटा होता है। बीते कुछ सालों में शोधकर्ताओं ने इस बात पर भी जोर देना शुरू किया है कि वाहनों के धुएं, अधजले फसल अवशेषों तथा धूल और रासायनिक अपशिष्ट से निकलने वाला एरोसोल जीवनदायी बरसात के मौसम को और अधिक कमज़ोर कर रहा है।

फसलों पर पड़ रहा असर

चौधरी चरण सिंह कृषि विवि हिसार के कृषि विज्ञान केंद्र की मौसम विशेषज्ञ डा. ममता ने बताया कि साल 2017 में सितंबर में 116.9 मिमी, 2018 में 177.9 मिमी, 2019 में 26.3 मिमी और 2020 में मात्र 7.3 मिमी वर्षा हुई थी। इन चार सालों में 2018 में सितंबर माह में सबसे अधिक बरसात के 12 दिन रहे थे। हिसार जिले में करीब एक लाख 18 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती की जाती है। इसमें से लगभग 1.12 लाख हेक्टेयर में धान की फसलें खड़ी हैं। करीब 70 हजार हेक्टेयर में धान की ऐसी वैरायटी है जो या तो पककर तैयार है, या पकाई की प्रक्रिया में है। हाल की बारिश ने इन फसलों को ज्यादा प्रभावित किया है। कृषि वैज्ञानिक रजनीश श्रीवास्तव का कहना है कि सितंबर महीने में ज्यादा बारिश से आने वाले समय में लगाई जाने वाली दलहनी फसलों को नुकसान होगा। मिट्टी में ज्यादा नमी के चलते दलहनी फसलों को लगाने में देरी होगी। हालांकि धान की फसल के लिए ये पानी काफी फायदेमंद है। इस समय धान में बालियां पड़ रही हैं ऐसे में ये पानी फसलों को काफी फायदा करेगा। लेकिन इस साल जुलाई और अगस्त में कम बारिश हुई जिससे शुरूआत में बहुत से किसानों की धान की फसल खराब हो गई।

ये हैं अल-नीनो और ला-नीना

अल-नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्य क्षेत्र की उस मौसमी घटना को कहते हैं, जिसमें पानी की सतह का तापमान सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है और हवा पूर्व की ओर बहने लगती है। यह न केवल समुद्र पर बल्कि वायुमंडल पर भी प्रभाव डालता है। इस घटना के चलते समुद्र का तापमान 4 से 5 डिग्री तक गर्म हो जाता है। ला नीना में पश्चिमी प्रशांत महासागर क्षेत्र में सामान्य से कम वायुदाब की स्थिति बनती है। इसके कारण समुद्र का तापमान सामान्य से घट जाता है। आमतौर पर इन दोनों घटनाओं का असर 9 से 12 महीने तक रहता है, पर कभी-कभी यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रह सकती है। दोनों घटनाएं दुनिया भर में बारिश, तूफान, बाढ़, सूखा जैसी घटनाओं को प्रभावित करती हैं। इनकी वजह से कहीं सामान्य से ज्यादा बारिश होती है तो कहीं सूखा पड़ता है, और कहीं तूफान आते हैं।

मानसून के पैटर्न में बदलाव

वैज्ञानिकों के अनुसार 1950 के दशक के बाद से दक्षिण एशिया में मानसून के पैटर्न में बदलाव आए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि अब मॉनसून के मौसम में एक लंबे शुष्क समय के बाद अचानक भारी बारिश का दौर आता है। गौर करने वाली बात यह है कि तापमान में एक डिग्री की वृद्धि से बारिश की मात्रा सात प्रतिशत तक बढ़ती है। मॉनसून के दिनों में यह 10 प्रतिशत तक जाती है। यही वजह है कि दक्षिण एशिया में अत्यधिक बारिश की घटनाओं के बढ़ने का अनुमान है।

Edited By: Anurag Mishra

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