नई दिल्ली, जागरण ब्यूरो। सरकार के लिए अगले वित्त वर्ष में राजकोषीय संतुलन बनाये रखने की दिक्कतें कम नहीं हुई हैं। राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को बजट में चालू वित्त वर्ष के 3.5 फीसद से और नीचे लाने के लिए सरकार को कई अन्य दबावों से गुजरना होगा। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक यह लक्ष्य पाने के लिए सरकार को राजस्व संग्रह की बड़ी चुनौती का सामना करना होगा।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मंगलवार को एक व्यापक आर्थिक सर्वेक्षण प्रस्तुत किया। केंद्र सरकार के लिए अगले वित्त वर्ष की राजकोषीय संभावनाओं को तलाशते हुए सर्वेक्षण कहता है कि वित्त मंत्री के लिए कर संग्रह के लक्ष्य तय करना आम बजट में सबसे चुनौतीपूर्ण होगा। बीते दो साल से सकल घरेलू अनुपात (जीडीपी) की तुलना में टैक्स का अनुपात हर साल लगभग आधा फीसद बढ़ा है। लेकिन अब कच्चे तेल की कीमतों में कमी की वजह से मिल रहा उत्पाद शुल्क का कर संग्रह में लाभ मिलना बंद हो जाएगा। यह कमी जीडीपी के 0.1 प्रतिशत अंक के बराबर हो सकती है। यह कमी वित्त वर्ष 2017 के 0.6 प्रतिशत अंक तक भी जा सकती है।

इसके अतिरिक्त जीएसटी का कार्यान्वयन भी वित्त मंत्री के लिए कर संग्रह के लक्ष्यों को निर्धारित करने महत्वपूर्ण साबित होगा। सर्वेक्षण के मुताबिक देश में जीएसटी संभवत: अगले वित्त वर्ष के उत्तरार्ध तक ही लागू हो पाएगा। अप्रत्यक्ष कर ढांचे में यह नया बदलाव प्रशासनिक लिहाज से इतना जटिल है कि राजस्व संग्रह के पूर्ण होने में कुछ समय लगेगा। सर्वेक्षण मानता है कि जीएसटी व नोटबंदी के कार्यान्वयन से होने वाले राजकोषीय लाभ प्राप्त करने में अभी समय लगेगा। लिहाजा इसकी तस्वीर सरकार के राजस्व संग्रह में दिखाना भी वित्त मंत्री के लिए काफी मुश्किल होगा।

इसके अतिरिक्त विनिवेश और स्पेक्ट्रम की बिक्री से प्राप्त होने वाले अनुमानित गैर कर राजस्व संग्रह में कमी और सातवें वेतन आयोग के अंतर्गत दिये गए भत्तों से भी राजकोषीय घाटे पर दबाव बन सकता है। यह दबाव अगले वित्त वर्ष में भी बने रहने की उम्मीद है। अलबत्ता वित्त मंत्री के सामने रणनीतिक विनिवेश से गैर कर राजस्व प्राप्त करने का एक विकल्प उपलब्ध रहेगा। इसी तरह चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक उपक्रमों पर भी दबाव बना रहा जिसकी वजह से वे सरकार को पर्याप्त लाभांश देने में विफल रहे। यह स्थिति अगले वित्त वर्ष में भी बनी रह सकती है।

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Posted By: Manish Negi

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